Aranyapantha

Philosophy
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Aranyapantha
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‘अरण्यपंथा’ में वे समस्त मौलिक दुविधाएँ अन्तर्निहित हैं जो ज्ञान के गहन प्रान्तरों में विद्यमान हैं, क्योंकि ‘अरण्यपंथा’ उन्हीं के अपार और संकीर्ण पथ से निकलती है। इसमें मात्र आशय है किन्तु प्रयोजन स्पष्ट नहीं है। यदि प्रयोजन के आग्रह को त्यागा जा सकता हो तो सम्भवतः ‘अरण्यपंथा’ रुचिकर लगे।

मैंने उपनिषद ग्रन्थों का पुनर्अध्ययन किया और यहाँ पाया कि मैं उनकी अनुभूतियों को पहले की अपेक्षा अधिक निकटता से अनुभव कर रहा था, तथापि ‘अरण्यपंथा’ न तो वैज्ञानिक व्याख्याओं में घुसती है और न ही उपनिषद को अपने तर्क का हिस्सा बनाने की चेष्टा करती है। सचमुच उपनिषद को तो इस पुस्तक के कथ्य में बिना स्पर्श करते हुए ही मात्र आनन्द के स्रोत की तरह उद्धृत किया गया है।

—लेखक की क़लम से

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Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2015
Edition Year 2015, Ed. 1st
Pages 103p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1
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Editorial Review

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Pt. Sanjay Tignath

Author: Pt. Sanjay Tignath

पं. संजय तिगनाथ

साठ के दशक के आरम्भ में मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर ज़िले में एक दूरस्थ छोटे-से गाँव बरौदिया के आडम्बर, कुरीतियों और अन्धविश्वासों से दूर एक सरल, नैष्ठिक ब्राह्मण परिवार में जन्म। शिक्षा ग्वालियर, रीवा, सागर में हुई। भूविज्ञान में एम-टेक एवं पी-एच.डी.। उच्च शिक्षा विभाग में भूविज्ञान विषय के अध्यापन का गत उनतीस वर्षों का अनुभव। जल-भूस्थलाकृति विज्ञान में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रुड़की से पोस्ट-डॉक्टोरल शोध-कार्य।

इतिहास, ज्योतिष, दर्शन, अध्यात्म और तंत्र में अभिरुचि।

प्रकाशित कार्य : ‘अरण्यपंथा’ (दर्शन), सात नोबेल पुरस्कृत मनीषियों के अध्यात्म एवं विज्ञान सम्बन्धी विचार (अनुवाद मूल अंग्रेज़ी से हिन्दी में)। अपने मूल विषय में राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोध-पत्र।

सम्पादक : ‘साय-फ्रंट्स : ए जर्नल ऑव मल्टिपल साइंसेज’।

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