Anchor Reporter

Communication and Media Studies
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जब कोई व्यक्ति टेलीविज़न के परदे पर समाचार देख रहा होता है तो उसके ज़ेहन में दो व्यक्ति अहम हो जाते हैं—एंकर और रिपोर्टर। एंकर जो टेलीविज़न के परदे पर पहले-पहल किसी ख़बर की सूचना देता है, उसके बारे में बताता है, तो रिपोर्टर वह होता है जो घटनास्थल से यह बता रहा होता है कि घटनाक्रम किस प्रकार घटित हुआ। वास्तव में किसी महत्त्वपूर्ण ख़बर के दौरान दर्शकों के लिए यह भी महत्त्वपूर्ण नहीं होता है कि वे चैनल कौन-सा देख रहे हैं, वह महत्त्वपूर्ण ख़बर जिस भी चैनल पर आ रही होती है, दर्शकों का रिमोट उसी चैनल पर ठहर जाता है। ऐसे में किसी समाचार चैनल के लिए एंकर और रिपोर्टर बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। क्योंकि दर्शकों को चैनल से जोड़ने का काम वही करते हैं। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि एंकर और रिपोर्टर को हर परिस्थिति को सँभालने में माहिर होना चाहिए। पुण्य प्रसून वाजपेयी ‘आजतक’ के प्रमुख एंकर थे। पेशे के रूप में एंकर-रिपोर्टर का काम क्या होता है, उसकी भूमिका क्या होती है, उसका काम कितना चुनौतीपूर्ण होता है—पुण्य प्रसून जी ने इन्हीं पहलुओं को विभिन्न कोणों से इस पुस्तक में रखा है। यह पुस्तक टी.वी. पत्रकारिता सीखनेवालों के लिए तो उपयोगी है ही, उनके लिए भी बड़े काम की साबित हो सकती है जो इन पेशों की चुनौतियों को जानना-समझना चाहते हैं। यह एक ‘इनसाइडर’ की ‘इनसाइड स्टोरी’ की तरह है।

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Language Hindi
Format Hard Back
Edition Year 2006
Pages 147p
Publisher Rajkamal Prakashan
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Editorial Review

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Punya Prasoon Vajpayee

Author: Punya Prasoon Vajpayee

पुण्‍य प्रसून वाजपेयी

समाज के अन्‍तर्विरोध को बतौर पत्रकार टटोलना फ़ि‍तरत है। एक ओर सत्ता का गुदगुदापन तो दूसरी ओर आम आदमी की खुरदुरी ज़मीन के सच को मुद्दों के ज़रिए लाने का प्रयास। विगत कई सालों से देश के हर उस क्षेत्र और लोगों के बीच जाकर उस आक्रोश को समझने का प्रयास जिसके बूते सत्ता या सरकार की नीतियों को ख़ारिज कर आन्दोलन खड़ा करने की कवायद हो रही है? प्रिंट से विज़ुअल मीडियम तक में नक्सली ज़मीन से लेकर कश्मीर की वादियों में लगनेवाले आज़ादी के नारों का सच कई तरह से कई बार रिपोर्टों में उभारा। इसी दौर में ‘लोकमत समाचार’, ‘चाणक्य’, ‘संडे ऑब्ज़र्वर’, ‘संडे मेल’, ‘दिनमान टाइम्स’, ‘जनसत्ता’ सरीखे समाचार पत्रों में काम करना, 1996 में टी.वी. समाचार चैनल ‘आजतक’ से जुड़ना, दिसम्बर 2000 में ‘आजतक’ के 24 घंटे न्यूज़ चैनल लांच होने के बाद पहली बार पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले कश्मीर ‘पीओके’ से रिपोर्ट उल्‍लेखनीय रहा। इसके साथ ही एल.ओ.सी. पार आतंकवादी कैम्पों की हक़ीक़त और लश्कर-ए-तोएबा के मुखिया मो. हाफ़‍िज़ सईद का इंटरव्यू लिया। जनवरी 2003 से अप्रैल 2004 तक ‘एनडीटीवी इंडिया’ न्यूज़ चैनल की शुरुआत से जुड़े। एंकरिंग और इंटरव्यू प्रोग्राम ‘कशमकश’ के ज़रिए टी.वी. पत्रकारिता में नायाब प्रोग्राम की शुरुआत की। दोबारा ‘आजतक’ में लौटे। इस पूरे दौर में संसद पर आतंकवादी हमला, फूलन की हत्या, मुशर्रफ़ की कश्मीर यात्रा, एन.डी.ए. सरकार के ‘शाइनिंग इंडिया’ कैम्पेन के फेल होने से लेकर अमेरिका के साथ परमाणु समझौते जैसे संवेदनशील मुद्दों से राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय मसलों पर एंकरिंग-रिपोर्टिंग की। हिन्दी न्यूज़ चैनलों के एकमात्र पत्रकार के तौर पर 2005 के लिए ‘रामनाथ गोयनका एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म अवार्ड’ से तत्‍कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा सम्मानित किए गए।

फ़िलहाल स्‍वतंत्र पत्रकारिता।

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