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Ram Kattha

Author: Hiralal Shukla
Translator: Rajendra Kumar Dube
Edition: 2014, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Lokbharti Prakashan
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Ram Kattha

आदिवासियों की कुडुख बोली की यह 'राम कत्था' उनके अपने जीवन, समाज, संस्कृति और वर्तमान तथा भविष्य की कथा है। यह उनकी अपनी सृष्टि को रचने और उसमें बसने की भी कथा है।
इस पुस्तक की रामकथा वही रामकथा है जो गोस्वामी तुलसीदास के 'रामचरितमानस' की रही है। बस अन्तर यह कि गोस्वामी जी ने तो रामकथा एक ही बार लिखी, पर इस जगत् के लोगों ने उसे अपने युग में अपनी-अपनी भाषा-बोली में बार-बार लिखा, और अब भी लिख रहे हैं। यह एक कृति की जन से जुड़ने की बड़ी सफलता होती है, जिसे गोस्वामी तुलसीदास ने कर दिखाया था। ज़ाहिर-सी बात है कि इस कथा में सबकी कथा थी और इस कथा की व्यथा में सबकी व्यथा, तभी तो यह कथा गाथा बनी और बनती रही है। हमें इस रूप में भी इस पुस्तक को देखना चाहिए कि इसी कथा में राम के साथ युद्ध में शामिल वे ही लोग थे, जो वानर, भालू, गिद्ध आदि जनजातियों के रूप में हाशिए की दुनिया के थे, और जिनके बल पर जीत हासिल करते हैं राम। यह पुस्तक एक पुस्तक ही नहीं, जनजातियों की तरफ़ से एक हस्तक्षेप भी है।

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Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Rajendra Kumar Dube
Editor Not Selected
Publication Year 2014
Edition Year 2014, Ed. 1st
Pages 116p
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 1
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Author: Hiralal Shukla

हीरालाल शुक्ल

शिक्षा : एम.ए. (संस्‍कृत), एम.ए. (भाषाविज्ञान), दर्शनशास्‍त्री, पीएच.डी. (संस्‍कृत)।

कार्य : भाषाविज्ञान विभाग, रविशंकर विश्‍वविद्यालय, रायपुर में प्राध्‍यापक।

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