Narak Masiha

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Narak Masiha
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आधुनिक समाज के हाशियों की उपेक्षित उदासियों का अन्वेषण करनेवाले भगवानदास मोरवाल ने इस उपन्यास में मुख्यधारा की ख़बर ली है। वह मुख्यधारा जो क़‍िस्म-क़‍िस्म की अमानवीय और असामाजिक गतिविधियों से उस ढाँचे का निर्माण करती है जिसे हम समाज के रूप में देखते-जानते हैं।

उपन्यास का विषय ग़ैर-सरकारी संगठनों की भीतरी दुनिया है, जहाँ देश के लोगों के दुःख दुकानों पर बिक्री के लिए रखी चीज़ों की तरह बेचे-ख़रीदे जाते हैं, और सामाजिक-आर्थिक विकास की गम्‍भीर भंगिमाएँ पलक झपकते बैंक बैलेंस में बदल जाती हैं।

यह उपन्यास बताता है कि आज़ादी के बाद वैचारिक-सामाजिक प्रतिबद्धताओं के सत्त्व का क्षरण कितनी तेज़ी से हुआ है, और आज वह कितने समजघाती रूप में हमारे बीच सक्रिय है। कल जो लोग समाज के लिए अपना सबकुछ न्योछावर करने की उदात्तता से दीप्त थे, कब और कैसे पूरे समाज, उसके पवित्र विचारों, विश्वासों, प्रतीकों और अवधारणाओं को अपने हित के लिए इस्तेमाल करने लगे और वह भी इतने निर्लज्ज आत्मविश्वास के साथ, इस पहेली को खोलना शायद आज के सबसे ज़रूरी कामों में से एक है। यह उपन्यास अपने विवरणों से हमें इस ज़रूरत को और गहराई से महसूस कराता है।

उपन्यास के पात्र अपने स्वार्थों की नग्नता में जिस तरह यहाँ प्रकट हुए हैं, वह डरावना है; पैसा कमाने के तर्क को वे जहाँ तक ले जा चुके हैं, वह एक ख़ौफ़नाक जगह है—सचमुच का नरक; और जिस भविष्य का संकेत यहाँ से मिलता है, वह वीभत्स है।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back, Paper Back
Publication Year 2014
Edition Year 2021, Ed. 3rd
Pages 288p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 2
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Editorial Review

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Bhagwandas Morwal

Author: Bhagwandas Morwal

भगवानदास मोरवाल

जन्म : 23 जनवरी, 1960; नगीना, ज़िला—मेवात (हरियाणा)।

शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी) एवं पत्रकारिता में डिप्लोमा।

प्रकाशित कृतियाँ : ‘काला पहाड़’ (1999), ‘बाबल तेरा देस में’ (2004), ‘रेत’ (2008) उर्दू में अनुवाद, ‘नरक मसीहा’ (2014) मराठी में अनुवाद, ‘हलाला’ (2015) उर्दू व अंग्रेज़ी में अनुवाद, ‘सुर बंजारन’ (2017), ‘वंचना’ (2019) तथा ‘शकुंतिका’ (2020) (उपन्यास); ‘सिला हुआ आदमी’ (1986), ‘सूर्यास्त से पहले’ (1990), ‘अस्सी मॉडल उर्फ़ सूबेदार’ (1994), ‘सीढ़ियाँ, माँ और उसका देवता’ (2008), ‘लक्ष्मण-रेखा’ (2010), ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’ (2014) (कहानी-संग्रह); ‘पकी जेठ का गुलमोहर’ (2016) (स्मृति-कथा); ‘लेखक का मन’ (2017) (वैचारिकी); ‘दोपहरी चुप है’ (1990) (कविता); ‘बच्चों के लिए कलयुगी पंचायत’ (1997) एवं अन्य दो पुस्तकों का सम्पादन।

सम्मान : ‘वनमाली कथा सम्मान’ (2019), भोपाल; ‘स्पंदन पुरस्कार’ (2017), भोपाल; ‘श्रवण सहाय एवार्ड’ (2012); ‘जनकवि मेहरसिंह सम्मान’ (2010), हरियाणा साहित्य अकादमी; ‘अन्तरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान’ (2009), लन्दन; ‘शब्द साधक ज्यूरी सम्मान’ (2009); ‘कथाक्रम सम्मान’ (2006), लखनऊ; ‘साहित्यकार सम्मान’ (2004), हिन्दी अकादमी, दिल्ली सरकार; ‘साहित्यिक कृति सम्मान’ (1994), हिन्दी अकादमी, दिल्ली सरकार; ‘साहित्यिक कृति सम्मान’ (1999), हिन्दी अकादमी, दिल्ली सरकार; पूर्व राष्ट्रपति श्री आर. वेंकटरमण द्वारा मद्रास का ‘राजाजी सम्मान’ (1995); ‘डॉ. अम्बेडकर सम्मान’ (1985), भारतीय दलित साहित्य अकादमी; ‘पत्रकारिता के लिए प्रभादत्त मेमोरियल एवार्ड’ (1985) तथा ‘शोभना एवार्ड’ (1984)।

जनवरी 2008 में ट्यूरिन (इटली) में आयोजित भारतीय लेखक सम्मेलन में शिरकत।

पूर्व सदस्य, हिन्दी अकादमी, दिल्ली सरकार एवं हरियाणा साहित्य अकादमी।

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