Chhaila Sandu

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Chhaila Sandu
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छैला सन्दु मुंडा समाज का एक मिथकीय पात्र है। उसके व्यक्तित्व को लेकर कई कथाएँ लोकसमाज में पाई जाती हैं। यही कारण है कि मुंडा समाज के इतिहास में छैला सन्दु का कोई लिखित उल्लेख न होने के बावजूद जन-साधारण की स्मृति में वह आज भी ज़िन्दा है।

साँवला रंग, छरहरा शरीर, आकर्षक व्यक्तित्व और मानवीय गुणों से भरपूर वह अपने समाज का बहुत प्रिय नायक है। वनवासी उसे कृष्ण का अवतार मानते हैं। कृष्ण की ही तरह वह बाँसुरीवादक और प्रकृति का अन्यतम प्रेमी है।

छैला के जीवन में निर्णायक मोड़ बुन्दी के प्रेम के रूप में आता है। बुन्दी सूबेदार हकीम सिंह की सबसे छोटी बेटी है। छैला पर बुन्दी को भगाने का आरोप लगता है, और सूबेदार उसकी तलाश में वनवासियों की बस्ती को उजाड़ देता है। अन्त में छैला बुन्दी के भविष्य के लिए अपने प्रेम का उत्सर्ग कर देता है।

छैला और बुन्दी के प्रेम प्रसंगों के माध्यम से उपन्यासकार ने इस पुस्तक में मुंडा समाज की तमाम ख़ूबियों-ख़राबियों, परम्पराओं और रीति-रिवाजों का प्रामाणिक चित्र प्रस्तुत किया है। वर्षों के शोध, परिश्रम और खोज के आधार पर कथाकार ने इस उपन्यास में छैला सन्दु के व्यक्तित्व को ऐतिहासिक रूप देने का भी प्रयास किया है।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2004
Edition Year 2004, Ed. 1st
Pages 315p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 1
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Editorial Review

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Author: Mangal Singh Munda

मंगल सिंह मुंडा

जन्म : 28 अप्रैल, 1945; रंगरोंग, खूँटी, राँची (झारखंड)।

शिक्षा : बी.ए. (पत्राचार—उत्कल, उड़ीसा)।

प्रमुख कृतियाँ: ‘महुआ का फूल’ (कहानी-संग्रह); ‘छैला सन्दु’ (उपन्यास)।

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