'आकारों के आसपास' की कहानियों को पढ़कर कुछ ऐसा आस्वाद मिलता है जो आम तौर पर आज की कहानियों से सुखद रूप में अलग है। एक तरह से इन कहानियों की दुनिया कोई ख़ास निजी दुनिया नहीं है, इनमें भी रोज़मर्रा की ज़ि‍न्‍दगी के ही आम परिचित अनुभवों को पेश किया गया है। मगर उन्हें देखनेवाली नज़र, उसके कोण और इन दोनों के कारण उभरनेवाले रूप और भाषाई संगठन का फ़र्क़ इतना बड़ा है कि इन कहानियों की दुनिया एकदम विशिष्ट और विस्मयकारी जान पड़ती है जिसमें किसी-न-किसी परिचित सम्बन्ध, अनुभव या रूख़ का या तो कोई अन्तर्विरोध या नया अर्थ खुल जाता है, या इसकी कोई नई परत उभर आती है—जैसा अक्सर कविता के बिम्बों से हुआ करता है।

कोई अजब नहीं कि इन कहानियों में यथार्थ और फैंटेसी के बीच लगातार आवाजाही है। फैंटेसी के साथ-साथ कुँवर नारायण अपनी बात कहने के लिए तीखे व्यंग्य के बजाय हलकी विडम्बना या 'आयरनी' का इस्तेमाल अधिक करते हैं। इसी से उनके यहाँ फूहड़ अतिरंजना या अति-नाटकीयता नहीं है, एक तरह का सुरोचिपूर्ण संवेदनशील निजीपन है ।

दरअसल, ये कहानियाँ काफ़ी फैले हुए फ़लक पा अनेक मानवीय नैतिक सम्‍बन्‍धों, प्रश्नों और मूल्यों को जाँचने, उधेड़ने और परिभाषित करने की कोशिश करती हैं, किसी क्रान्तिकारी मुद्रा में नहीं, बल्कि असलियत की बेझिझक निजी पहचान के इरादे से।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 1971
Edition Year 2022, Ed. 4th
Pages 135p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22.5 X 14.5 X 1.5
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You're reviewing:Aakaron Ke Aaspas
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Kunwar Narain

Author: Kunwar Narain

कुँवर नारायण

कुँवर नारायण (19 सितम्बर, 1927—15 नवम्बर, 2017) ने बीसवीं और इक्कीसवीं सदियों की सन्धि-रेखा के दोनों ओर फैले हुए अपने गुणात्मक लेखन में अध्ययन की व्यापकता, सरोकारों की विविधता और जीवनानुभवों के सौन्दर्य-बोध के कारण कई पीढ़ियों की रचना और जीवन-दृष्टि को निरन्तर समृद्ध किया है। अपनी सिसृक्षा में उनका कवि और सम्पूर्ण कृतित्व एक पूरी पारिस्थितिकी का निर्माण करता है और इसके लिए सदैव अपनी प्रतिबद्धता भी ज़ाहिर करता रहा है। उनके जीवन और कविताओं में परस्पर साहचर्य के अन्तर्निहित भाव को आद्यन्त लक्षित किया जा सकता है जो आज भी उनकी उपस्थिति को सम्भव और मूर्त करता है।

प्रकाशित कृतियाँ : ‘चक्रव्यूह’, ‘तीसरा सप्तक’ (सहयोगी कवि), ‘परिवेश : हम-तुम’, ‘अपने सामने’, ‘कोई दूसरा नहीं’, ‘इन दिनों’, ‘हाशिए का गवाह’, ‘सब इतना असमाप्‍त’ (कविता); ‘आत्मजयी’, ‘वाजश्रवा के बहाने’, ‘कुमारजीव’ (प्रबन्ध-काव्य); ‘आकारों के आसपास’, ‘बेचैन पत्तों का कोरस’ (कहानी); ‘आज और आज से पहले’, ‘साहित्य के कुछ अन्तर्विषयक सन्दर्भ’, ‘दिशाओं का खुला आकाश’, ‘शब्द और देशकाल’, ‘रुख़’ (आलोचना व वैचारिक गद्य); ‘लेखक का सिनेमा’ (विश्व सिने-समीक्षा); ‘मेरे साक्षात्कार’, ‘तट पर हूँ पर तटस्थ नहीं’ (साक्षात्कार); ‘न सीमाएँ न दूरियाँ’ (अनुवाद)। अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में रचनाओं के पुस्तकाकार अनुवाद और संचयन, उन पर केन्द्रित शोध और आलोचनात्मक लेखन।

प्रमुख सम्मान : ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’, ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’, ‘शलाका सम्मान’, ‘राष्ट्रीय कबीर सम्मान’, रोम का अन्तरराष्ट्रीय 'प्रीमिओ फ़ेरोनिआ’, वॉरसॉ यूनिवर्सिटी का ‘ऑनरेरी मैडल’, 'पद्मभूषण’, साहित्य अकादेमी की 'महत्तर सदस्यता’ आदि।

 

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