Upnishdon ke Samvad

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Upnishdon Ke Samvad
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उपनिषद् भारत के गौरव-ग्रंथ हैं। ये वेदों के अंतिम भाग हैं। वैसे तो ये विश्वप्रसिद्ध ग्रंथ हैं, किंतु दुःख की बात है कि इनसे हम भारतीय ही बहुत कम परिचित हैं। अत्यंत सरल किंतु ओजस्वी भाषा में ये ग्रंथ दार्शनिक समस्याओं पर विचार करते हैं, ऐसी दार्शनिक समस्याओं पर जो मानवजीवन से जुड़ी हुई हैं। ये भारत को श्रेष्ठ मार्ग तो दिखाते ही हैं...प्रेरित करते हैं...चेतावनी भी देते हैं कि यदि हमने इसे नहीं अपनाया तो जीवन में महान हानि निश्चित है।       

इस तरह उपनिषदों की शिक्षा सदियों से मानव पर उपकार करती आई है। उपनिषदों ने न केवल भारतीयों को अथवा हिंदुओं को प्रभावित किया है वरन् इन्होंने अन्य देश एवं धर्म के लोगों को भी प्रभावित किया है। अनेक विदेशी विद्वान भी इनके मुरीद हुये हैं। इनसे न केवल परवर्ती आस्तिक दर्शन सिंचित हुये हैं वरन् नास्तिक दर्शन भी सिंचित हुये हैं।

उपनिषदों की एक बड़ी विशेषता यह भी रही है कि वेदों के कर्मकांड की ओर बढ़ते कदमों को रोककर यहां के तेजस्वी ऋषियों ने ज्ञानकांड की गंगा बहाकर भारतीय दर्शन, भारतीय समाज और भारतीय धर्म को एक नई दिशा की ओर मोड़ा है। भगवत्गीता पर उपनिषदों का अत्यंत प्रभाव पड़ा है। गीता को इसीलिये उपनिषदों का सार कहा जाता है।

उपनिषदों के विचार मुख्यतः गुरु और शिष्य के मध्य संवाद रुप में प्रस्तुत हुये हैं। वैसे तो उपनिषदों की संख्या 108 मानी जाती है किंतु इस ग्रंथ में हमने 11 प्रमुख उपनिषदों में आये संवादों को 31 अध्यायों में प्रस्तुत किया है। बृहदारण्यक एवं छांदोग्य उपनिषद् से सर्वाधिक संवाद लिये गये हैं जो इन उपनिषदों का बृहत् आकार देखते हुये स्वाभाविक है।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back, Paper Back
Publication Year 2021
Edition Year 2021, Ed. 1st
Pages 190p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 22.2 X 14.5 X 1.7
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Editorial Review

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Shobha Nigam

Author: Shobha Nigam

शोभा निगम

डॉ. शोभा निगम ने 1970 में पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान

प्राप्त करते हुये एम.ए. की उपाधि तथा इसी विश्वविद्यालय से सन् 1980 में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। सन् 1973 में वे छतीसगढ़ महाविद्यालय में दर्शनशास्त्र की व्याख्याता नियुक्त हुईं। तब से 2008

तक उन्‍होंने लगातार दर्शनशास्त्र का क़रीब 35 साल तक अध्यापन किया है। इस बीच वे इसी महाविद्यालय में रहते हुए प्रोफ़ेसर भी बनीं और फिर शासकीय महाविद्यालय, आरंग में प्राचार्य-पद का दायित्व निर्वहन करते हुए सन् 2010 में सेवानिवृत्त हुईं।

प्रकाशित पुस्तकें : ‘पाश्चात्य दर्शन के सम्प्रदाय’, ‘श्रीमद्वाल्लभाचार्य : उनका शुद्धाद्वैत एवं पुष्टिमार्ग’, ‘नीतिदर्शन’, ‘आधुनिक पाश्चात्य दर्शन’, ‘भारतीय दर्शन’, ‘दर्शन, मानव और समाज’, ‘सुकरात : एक महात्मा’, ‘पाश्चात्यदर्शन का ऐतिहासिक सर्वेक्षण’, ‘अन्य पुरुष’, ‘व्यास-कथा’, ‘यूनानी दार्शनिक चिन्तन’, ‘सलीब पर टँगा एक मसीहा : ईसा’, ‘वाल्मीकि रामायण के पात्र’ आदि ।

सम्मान : ‘डालमिया पुरस्कार’, ‘वागीश्वरी पुरस्कार’ आदि।

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