Radio Natak Ki Kala-Hard Cover

Communication and Media Studies
Author: Siddhnath Kumar
Special Price ₹316.00 Regular Price ₹395.00
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ISBN:9788171190874
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Radio Natak Ki Kala-Hard Cover
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‘रेडियो नाटक’ की कला सन् 1988 के ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार’ से सम्मानित है।

डॉ. सिद्धनाथ कुमार रेडियो नाटकों के जाने-पहचाने लेखक और अध्येता थे। सन् 1948 में ही वे रेडियो नाट्य-लेखन से जुड़े। सन् 1955 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘रेडियो नाट्य शिल्प’ काफ़ी चर्चित हुई। अनेक लेखक और अध्येता इस नई विधा की प्रथम पुस्तक से लाभान्वित हुए।

‘रेडियो नाटक की कला’ में लेखक ने अपने दीर्घकालीन नाट्य-लेखन के अनुभव एवं विषयगत व्यापक अध्ययन के आधार पर रेडियो नाट्य विधा का सूक्ष्म एवं व्यापक विवेचन किया है। रेडियो नाटक के व्यावहारिक लेखन और सैद्धान्तिक अध्ययन, दोनों ही दृष्टियों से पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी, ऐसा हमारा विश्वास है।

डॉ. सिद्धनाथ कुमार नाट्यालोचक भी थे और उन्होंने रेडियो नाटकों के प्रसंग में वस्तु-विन्यास, चरित्र, संवाद आदि का जो विवेचन किया है, वह सामान्य नाटक के शिल्प में रुचि रखनेवाले लेखकों और अध्येताओं के लिए भी महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगा।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 1992
Edition Year 2018, Ed. 5th
Pages 174p
Price ₹395.00
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22.5 X 14 X 1.5
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Editorial Review

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Author: Siddhnath Kumar

सिद्धनाथ कुमार

जन्म : 13 अगस्त, 1927; बक्सर (बिहार)।

शिक्षा : एम.ए., पीएच.डी, डी.लिट्.।

कुछ कॉलेजों में अध्यापन, आकाशवाणी के पटना केन्द्र में नाटक-लेखक और सहायक प्रोड्यूसर। सन् 1962 से निरन्तर राँची विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में रहे। वहीं से प्रोफ़ेसर पद से अगस्त, 1989 में सेवानिवृत्त।

कृतियाँ : ‘प्रसाद के नाटकों का पुनर्मूल्यांकन’, ‘हिन्दी एकांकी की शिल्पविधि का विकास’, ‘हिन्दी एकांकी’, ‘रेडियो नाट्य-शिल्प’, ‘वार्ता-शिल्प’, ‘रेडियो नाटक की कला’, ‘हिन्दी पद्यनाटक : सिद्धान्त और इतिहास’, ‘संवेदना और शिल्प’; समीक्षा-शृंखला की पाँच पुस्तकों में : ‘आधे-अधूरे’ (मोहन राकेश), ‘अंधेर नगरी’ (भारतेन्दु), ‘भारतदुर्दशा’ (भारतेन्दु), ‘चन्द्रगुप्त’ (प्रसाद) और ‘स्कंदगुप्त’ (प्रसाद) का अध्ययन; ‘टूटा हुआ आदमी’ और ‘जिन्दगी, तुम कहाँ हो?’ (काव्य); ‘कवि, सृष्टि की साँझ और अन्य काव्यनाटक’, ‘रंग और रूप’, ‘वे अभी भी क्वाँरी हैं’, ‘आदमी है नहीं है’, ‘मुर्दे जिएँगे’, ‘रोशनी शेष है’, ’आतंक’, ‘रास्ता बन्द है’ और ‘अशोक’ (नाटक); ‘कमाल कुर्सी का’, ‘चमचे वही रहे’, ‘मिले सुर मेरा-तुम्हारा’, ‘मियाँ-बीवी राज़ी तो’, ‘देशभक्ति की जय’ (व्यंग्य); जीवनचरित और बाल-साहित्य की अनेक पुस्तकें। ‘हिन्दी साहित्य कोश’, ‘हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास’ आदि अनेक सन्दर्भ ग्रन्थों में टिप्पणियाँ और लेख।

सम्मान : सन् 1954 में वॉयस ऑफ़ अमेरिका की हिन्दी सर्विस द्वारा आयोजित रेडियो रूपक प्रतियोगिता में एक रूपक सर्वश्रेष्ठ रूप में पुरस्कृत। नाट्य कृतियों के लिए ‘राधाकृष्ण पुरस्कार’, ‘रामवृक्ष बेनीपुरी’ पुरस्कार (राजभाषा विभाग, बिहार); ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार’ (सूचना और प्रसारण मंत्रालय) आदि द्वारा सम्मानित।

 

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