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Hindi Aalochana Ki Paaribhashik Shabdavali-Hard Cover

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9788126716524
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आधुनिक हिन्‍दी आलोचना की आयु भले ही सौ-सवा सौ वर्ष हो किन्‍तु उसने इतनी तेज़ी से डग भरे कि इस अल्प अवधि में ही दुनिया की किसी भी दूसरी समृद्ध भाषा से होड़ लेने में सक्षम है।

आज हिन्‍दी आलोचना में जो पारिभाषिक शब्द प्रचलित हैं, उनके मुख्यतः तीन स्रोत हैं। उनमें सबसे प्रमुख स्रोत हमारा संस्कृत काव्यशास्त्र है, जिसकी समृद्धि तद्युगीन विश्वसाहित्य में अतुलनीय है। हिन्‍दी आलोचना की समृद्धि के पीछे उसकी अपनी यही विरासत है। दूसरा स्रोत यूरोप का साहित्यशास्त्र है, जिससे हमारे लगभग साढ़े तीन सौ वर्ष से सम्‍बन्‍ध हैं। पिछले कुछ दशकों में उदारीकरण और भूमंडलीकरण के चलते यूरोप से अनेक नए पारिभाषिक शब्द हिन्‍दी में आए हैं, जिन्हें हिन्‍दी ने पूरी उदारता से ग्रहण किया है। इसी के साथ हिन्‍दी आलोचना ने अनेक शब्द स्वयं भी विकसित किए हैं।

इस समृद्धि के बावजूद हिन्‍दी आलोचना में प्रचलित बहुतेरे पारिभाषिक शब्दों की अवधारणा को रेखांकित करनेवाली पुस्तक की कमी लगातार महसूस की जा रही थी। समकालीन हिन्‍दी आलोचना की इस अनिवार्य आवश्यकता को पूरी करनेवाली यह अकेली पुस्तक है—हिन्‍दी साहित्य के सुधी अध्येताओं के लिए अनिवार्यतः संग्रहणीय।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2009
Edition Year 2022, Ed. 5th
Pages 400P
Price ₹1,395.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 25 X 16 X 3
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Dr. Amarnath

Author: Dr. Amarnath

डॉ. अमरनाथ

11 सितम्बर, 1953 को गाँव—रामपुर बुजुर्ग, जिला—महाराजगंज, उत्तर प्रदेश में जन्मे डॉ. अमरनाथ ने गोरखपुर विश्वविद्यालय से एम.ए., पी-एच.डी. की उपाधि अर्जित की।

हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के बीच सेतु निर्मित करने एवं भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा के उद्देश्य से ‘अपनी भाषा’ नामक संस्था के गठन और संचालन में केन्द्रीय भूमिका। संस्था की पत्रिका ‘भाषा विमर्श’ का सन् 2000 से 2020 तक सम्पादन। हिन्दी परिवार को टूटने से बचाने और उसकी बोलियों को हिन्दी के साथ संगठित रखने के उद्देश्य से ‘हिन्दी बचाओ मंच’ का गठन और उसकी ओर से राष्ट्रव्यापी जन-जागरण अभियान का नेतृत्व। अपने गाँव में ‘श्री चंद्रिका शर्मा फूला देवी स्मृति सेवा ट्रस्ट’ का गठन और उसके मुख्य ट्रस्टी। ट्रस्ट की ओर से ‘ग्राम स्वराज पुस्तकालय’ का संचालन, उसकी पत्रिका ‘गाँव’ का सम्पादन एवं ग्राम केन्द्रित अन्य सामाजिक कार्यों में संलग्न।

‘हिन्दी आलोचना का आलोचनात्मक इतिहास’, ‘हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली’, ‘आजाद भारत के असली सितारे’ (दो खण्ड), ‘नारी का मुक्ति संघर्ष’, ‘हिन्दी जाति’, ‘आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और परवर्ती आलोचना’, ‘आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का काव्य-चिन्तन’ आदि मौलिक कृतियों का प्रणयन एवं ‘समकालीन शोध के आयाम’, ‘हिन्दी भाषा का समाजशास्त्र’, ‘बाँसगाँव की विभूतियाँ’ आदि का सम्पादन किया।

हिन्दी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष।

ई-मेल : [email protected]

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