Pragatisheel Aalochana Aur Namvar Singh

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Pragatisheel Aalochana Aur Namvar Singh

प्रगतिशील आलोचना के सन्दर्भ में नामवर सिंह का मूल्यांकन किया जाए तो यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने प्रगतिशील आलोचना को विस्तार दिया और उसे नयी ऊर्जा व जीवन्तता प्रदान की। नवीन विचारों, सिद्धान्तों और मूल्यों को आत्मसात करते हुए वे सदैव प्रगतिशील मूल्यों  की रक्षा करते रहे, साथ ही प्रगतिशीलता की राह में बाधक तत्त्वों से हिन्दी-समाज को सावधान भी करते रहे।

उनकी प्रगतिशील दृष्टि में वाद, विवाद और संवाद के जरिए ही कोई विमर्श अपनी पूर्णता को प्राप्त कर सकता है। इसे ही मार्क्सवाद में थीसिस, एंटी-थीसिस और सिंथेसिस  कहा जाता है। लेकिन मार्क्सवादी विचार को वे अनुकरणमूलक ढंग से नहीं स्वीकारते, वे उसे साहित्यिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी के रूप में देखते हैं जिसका एक व्यापक और व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य है।

उनकी प्रगतिशील आलोचना-दृष्टि विभिन्न वादों, सिद्धान्तों और विचारधाराओं से मुठभेड़ करते हुए प्रगतिशीलता की रक्षा करती है। वर्तमान परिस्थितियों में मार्क्सवाद को जीवन्त बनाए रखने के लिए उन्होंने उन जड़ताओं पर भी प्रहार किया जो प्रगतिशील मूल्यों के रास्ते में बाधा उत्पन्न कर सकती थीं। नए प्रतिमान तलाशते हुए वे परम्परा की खोज करते हैं और आधुनिक प्रवृत्तियों की पड़ताल भी करते रहते हैं।

नामवर सिंह की प्रगतिशील आलोचना जितनी भारतीय सन्दर्भ से जुड़ी है, उतनी ही पाश्चात्य सन्दर्भ से भी। प्रगतिवादी कवियों को प्रयोगवादी शिल्प के खतरों से सचेत करते हुए वे विदेश से आयातित ह्रासोन्मुख भावनाओं, युद्धजनित अनास्था, वैयक्तिक असन्तोष तथा कुंठाओं के खतरे से भी रचनाकारों को सतर्क करते हैं। आलोचना के अन्तर्गत परम्परा के स्वाभाविक विकास के साथ-साथ द्वन्द्वात्मक विकास को महत्व देते हुए वे स्थापित करते हैं कि विकास विरोध से निर्मित होता है, परिपाटी-पालन से नहीं। उनके अनुसार प्रगतिशीलता अपने युग की प्रगतिशील शक्तियों की पहचान पर निर्भर होती है। इसीलिए वे मार्क्सवाद के नाम पर छद्म क्रान्तिकारिता का विरोध करते हैं, परम्परा-पूजा से सावधान करते हैं और सांस्कृतिक विरासत को आलोचनात्मक ढंग से देखने की अपील करते हैं।

यह शोध-ग्रन्थ उनकी प्रगतिशील सोच और उससे उत्पन्न उनकी आलोचना-दृष्टि  की जड़ों की खोज है जो नामवर-साहित्य के अलावा उससे सम्बन्धित व्यापक संदर्भ-सामग्री के अध्ययन से संभव हुई है।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2023
Edition Year 2023, Ed. 1st
Pages 296p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 22.5 X 14.5 X 2.5
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Editorial Review

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Vijay Kumar Bharti

Author: Vijay Kumar Bharti

विजय कुमार भारती

विजय कुमार भारती का जन्म 1 जून, 1967 को गौरीपुर, पश्चिम बंगाल में हुआ। उनकी आरम्भिक शिक्षा गौरीपुर में ही हुई। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर (हिन्दी) किया। ‘प्रगतिशील आलोचना के सन्दर्भ में नामवर सिंह के आलोचना कर्म का अध्ययन’ विषय पर विश्वभारती, शान्तिनिकेतन से पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने बर्दवान विश्वविद्यालय और दार्जिलिंग गवर्नमेंट कॉलेज में अध्यापन किया। काज़ी नज़रुल विश्वविद्यालय में संकायाध्यक्ष रहे। साहित्य, समाज, संस्कृति, मानवीय मूल्यबोध एवं दलित लेखन और चिन्तन के सन्दर्भ में देश भर के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके शोध-पत्र, अनुवाद कार्य एवं आलेख प्रकाशित हुए हैं। विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक कार्यों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही है।

उन्हें ‘साहित्य शिरोमणि सम्मान’ एवं ‘क्षिति मोहन सेन भाषा सेतु सम्मान’, आदि कई सम्मानों से सम्मानित किया गया है।

सम्प्रति : प्रोफेसर, काज़ी नज़रुल विश्वविद्यालय, आसनसोल, पश्चिम बंगाल। सदस्य, पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी एवं पश्चिम बंग दलित अकादमी।

ई-मेल : vkbharty@gmail.com

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