Johar Jharkhand

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प्रोफ़ेसर अमर कुमार सिंह देश के प्रमुख मनोवैज्ञानिकों में से एक रहे। वे देश के उन थोड़े से समाजशास्त्रियों में थे, जिन्होंने अकादमिक दुनिया से बाहर आकर समाचार-पत्रों में मानवीय विकास, धर्मनिरपेक्षता, महिलाओं, आदिवासियों, दलितों और वंचित समूहों की समस्याओं पर गम्भीर लेकिन लोकप्रिय शैली में लेखन किया। उनके इन लेखों ने राजनीतिक–सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप एवं विमर्श पैदा किया है। झारखंड आन्दोलन के समर्पित कार्यकर्ता के रूप में डॉ. सिंह के लेखों में एक ख़ास क़िस्म का अनुभव है। डॉ. सिंह ने झारखंड विषयक समिति के सदस्य के रूप में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई, इस कारण आलेखों में एक ‘इनसाइडर’ जनदृष्टि की झलक मिलती है। डॉ. सिंह के नेतृत्व में झारखंड की आर्थिक–सामाजिक समस्याओं पर पिछले दशक में अनेक शोधकार्य हुए। इन शोध निष्कर्षों से आदिवासी भूमि, आदिवासी सशक्तिकरण, आदिवासी महिलाओं की स्थिति, झारखंड में सत्ता में विकेन्द्रीकरण के सवालों को व्यापक परिप्रेक्ष्य मिलता है।

डॉ. सिंह के आलेखों का यह प्रतिनिधि संग्रह है, जिसमें झारखंड सम्बन्धी उनकी चिन्ता तो ज़ाहिर होती है, साथ ही झारखंड की सम्भावनाओं, अन्तर्विरोधों और संकटों को समझने में मदद मिलती है। ये आलेख ‘प्रभात ख़बर’ तथा ‘सोशल चेंज’ में प्रकाशित हुए तथा इनसे झारखंड आन्दोलन में बहस को गति एवं दिशा मिली। आन्तरिक उपनिवेशवाद की अवधारणा को डॉ. सिंह ने झारखंड के उद्धरण के साथ राष्ट्रीय बहस का केन्द्र भी बनाया। विकास के साम्प्रतिक दृष्टिकोण में यह बहस कई शंकाओं एवं यथार्थों का रेखांकन करते हुए विकल्पों का क्षितिज खोलती है। डॉ. सिंह ने झारखंडी कार्यकर्ता के अनुभवों के आधार पर राजनीतिक विमर्श के अनेक अनछुए पहलुओं को उठाया है। आदिवासियों के प्रति वंचन एवं अन्याय उनके आलेखों के गहरे सरोकारों में हैं, लेकिन इनमें यह भी दृष्टि मौजूद है कि ग़ैर-आदिवासियों के साथ अन्याय न हो।

कई ज़मीनी विशेषताओं के कारण झारखंड नवनिर्माण से लेकर आज तक इन आलेखों का महत्त्व अपनी भूमिका में प्रमुखता से बना हुआ है।

 

 

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2002
Edition Year 2003
Pages 118p
Translator Not Selected
Editor Ramesh Sharan
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1
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Editorial Review

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Author: Amar Kumar Singh

अमर कुमार सिंह

झारखंड आन्दोलन के सैद्धान्तिक भाष्यकारों में से एक। प्रो. सिंह ने मनोविज्ञान के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई, लेकिन वे जाने-माने समाजशास्त्री भी थे।

वे लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स और हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय से पढ़े-लिखे। पर अपनी जड़ों से जुड़े रहे। झारखंड आन्दोलन के बारे में उन्होंने हिन्दी में लिखना शुरू किया, ताकि साधारण लोग इसके सैद्धान्तिक पक्ष को जानें। उन्होंने झारखंड आन्दोलन को बौद्धिक धार ही प्रदान नहीं की, वे एक कार्यकर्ता की तरह आन्दोलन में सक्रिय भी रहे। वे अपने व्यवहार, स्वभाव और संवेदनशीलता के कारण झारखंडी समाज के इतर भी समान रूप से सम्मानित थे। झारखंड को लेकर केन्द्र सरकार से हुई शीर्ष वार्ताओं में वे रहे, आन्दोलनकारियों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका में रहे। आज जो झारखंड अपने साकार रूप में है, इसमें उनका एक बहुत बड़ा योगदान है।

प्रो. सिंह झारखंड से जुड़े मूल सवालों के महज़ दार्शनिक या सैद्धान्तिक व्याख्याकार ही नहीं थे, बल्कि राँची विश्वविद्यालय के कुलपति और सिद्धू-कान्हू विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति के रूप में उन्होंने अपनी प्रशासकीय व सांगठनिक क्षमता का भी परिचय दिया।

सन् 1999 में असामयिक निधन।

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