Adhoora Koi Nahin

Poetry
500%
() Reviews
As low as ₹200.00 Regular Price ₹250.00
You Save 20%
ISBN:9788183616560
In stock
Only %1 left
SKU
Adhoora Koi Nahin
- +

यह 1998 का साल था, जब आर. अनुराधा को पता चला कि उन्हें स्तन कैंसर है। उन दिनों कैंसर आज के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा डरावना था। लेकिन अनुराधा ने बड़े हौसले के साथ इस बीमारी का सामना किया। हँसते हुए, घूमते हुए, दोस्तों से फ़ोन पर बतियाते हुए, पढ़ते हुए, लिखते हुए, इन सबके बीच कीमोथेरेपी के कई यंत्रणादायी दौर झेलते हुए, अपने बाल झड़ते देखते हुए, अपनी कमज़ोर पड़ती प्रतिरोधक क्षमता को महसूस करते हुए। सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी के बाद अन्तत: वे इन सबसे उबरीं। लेकिन इस दौर में हासिल अनुभव पर उन्होंने एक किताब लिखी—‘इन्द्रधनुष के पीछे-पीछे : एक कैंसर विजेता की डायरी’।

2005 के शुरू में जामिया मिल्लिया के कुछ छात्रों ने अनुराधा पर एक फ़‍िल्म बनाई—‘भोर’। पूरी फ़‍िल्म में अनुराधा की आवाज़ के अलावा कोई वायस ओवर नहीं है। फ़‍िल्म में अनुराधा बताती हैं—कैंसर के ख़‍िलाफ़ जंग में शरीर एक मैदान होता है, लेकिन यह लड़ाई बहुत सारे लोगों की मदद से जीती जाती है। घर-परिवार, दोस्त-रिश्तेदार इस युद्ध में ज़रूरी रसद पहुँचाने का काम करते हैं। जब यह फ़‍िल्म बन ही रही थी कि अनुराधा को दुबारा कैंसर ने घेर लिया। फिर वही कीमोथेरेपी, सर्जरी, रेडियोथेरेपी वही सब कुछ और वही हिम्मत—अनुराधा ने इस दौरान भी फ़‍िल्म शूट करने की इजाज़त दी।

जैसा कि दोस्तों को भरोसा था, अनुराधा यह जंग भी जीतकर निकलीं। इस दौरान उन्होंने कैंसर के डर के ख़‍िलाफ़ एक पूरी लड़ाई छेड़ी। कैंसर की जद में आई दूसरी महिलाओं से जुड़ीं, यह समझाती रहीं कि कैंसर से लड़ा जा सकता है और बताती रहीं कि कैसे लड़ा जा सकता है.

साल 2012 में अनुराधा को फिर से कैंसर ने घेर लिया। इस बार उसने उनकी हड्डियों पर हमला किया है। हमेशा की तरह अनुराधा लड़ती रहीं. हमेशा की तरह. और इस बार उन्होंने बहुत सारी कविताएँ लिखीं।

मैं क़तई नहीं चाहूँगा कि आप इन कविताओं को किसी सहानुभूति के साथ पढ़ें। अनुराधा को ऐसी सहानुभूति नहीं चाहिए। वह हममें से कई लोगों से ज़्यादा स्वस्थ और मज़बूत बनी रहीं। हाँ, इन कविताओं के आस्वाद के लिए ज़रूरी है कि इन्हें कलावादी आग्रहों के जंजाल से बाहर निकलकर संवेदनशीलता से पढ़ा जाए। वैसे भी ये सिर्फ़ निजी तकलीफ़ की कविताएँ नहीं हैं, ये दर्द और मृत्यु के विरुद्ध मनुष्य के साझा युद्ध की कविताएँ हैं।

—प्रियदर्शन

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2014
Edition Year 2014, Ed. 1st
Pages 100p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 20 X 14 X 2
Write Your Own Review
You're reviewing:Adhoora Koi Nahin
Your Rating

Editorial Review

It is a long established fact that a reader will be distracted by the readable content of a page when looking at its layout. The point of using Lorem Ipsum is that it has a more-or-less normal distribution of letters, as opposed to using 'Content here

R. Anuradha

Author: R. Anuradha

आर. अनुराधा

जन्म : 11 अक्टूबर, 1967 को मध्यप्रदेश (अब छत्तीसगढ़) के बिलासपुर ज़‍िले में।

छह महीने की उम्र में परिवार जबलपुर आ गया। तब से लेकर नौकरी के लिए दिल्ली आकर बसने तक का जीवन वहीं बीता।

दक्षिण भारतीय परिवार में जन्म के बावजूद हिन्दी भाषा और अपने हिन्दी भाषी प्रदेश से जुड़ाव ज्‍़यादा रहा। जीव विज्ञान में डिग्री के बाद शुरू से ही पढ़ने-लिखने में रुचि की वजह से पत्रकारिता की ओर क़दम बढ़ाया। जबलपुर के रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से पत्रकारिता और संचार में उपाधि, समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर। दिल्ली में बाल-पत्रिका ‘चम्पक’ में कुछ महीनों की उप-सम्पादकी के बाद टाइम्स प्रकाशन समूह में सामाजिक पत्रकारिता में प्रशिक्षण और स्नातकोत्तर डिप्लोमा। हिन्दी अख़बार ‘दैनिक जागरण’ में कुछ महीने उप-सम्पादक। 1991 में भारतीय सूचना सेवा में प्रवेश। पत्र सूचना कार्यालय में लम्बा समय बिताने और फिर कोई तीन साल डीडी न्यूज़ में समाचार सम्पादक की भूमिका निभाने के बाद दिसम्बर, 2006 से प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार में सम्पादक।

बाल साहित्य, विज्ञान और समाज से जुड़े विविध विषयों पर 25 पुस्तकों का सम्पादन। कैंसर से अपनी पहली लड़ाई पर बहुचर्चित आत्मकथात्मक पुस्तक—‘इन्द्रधनुष के पीछे-पीछे : एक कैंसर विजेता की डायरी’ राधाकृष्ण प्रकाशन से 2005 में प्रकाशित। इसका गुजराती में अनुवाद साहित्य संगम प्रकाशन, सूरत से प्रकाशित। बांग्ला में भी अनुवाद। पत्रकारिता के महारथी सुरेन्द्र प्रताप सिंह के आलेखों का पहला संकलन-सम्पादन ‘पत्रकारिता का महानायक : सुरेन्द्र प्रताप सिंह’ (संचयन) राजकमल प्रकाशन से 2011 में प्रकाशित। विभिन्न महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में विशेष रूप से विज्ञान, समाज और महिलाओं से जुड़े विषयों पर सतत लेखन। प्रकाशन विभाग की राष्ट्रीय और मंत्रालय स्तर पर पुरस्कृत गृहपत्रिका ‘प्रकाश भारती’ के सम्पादक-मंडल में। कैंसर-जागरूकता के कार्य हेतु उत्तर प्रदेशीय महिला मंच का ‘हिन्दप्रभा पुरस्कार—2010’ से सम्‍मानित।

निधन : 2014 में।

Read More
Books by this Author

Back to Top