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Travelogue
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जितनी बड़ी दुनिया बाहर है, उतनी ही बड़ी एक दुनिया हमारे अन्दर भी है, अपने ऋषियों-मुनियों की कहानियाँ सुनकर लगता है कि वे सिर्फ़ भीतर ही चले होंगे। यह किताब इन दोनों दुनियाओं को जोड़ती हुई चलती है। यह महसूस कराते हुए कि भीतर की मंज़‍िलों को हम बाहर चलते हुए भी छू सकते हैं, बशर्ते अपने आप को लादकर न चले हों। उतना ही एकान्‍त साथ लेकर निकले हों जितना एकान्‍त ऋषि अपने भीतर की यात्रा पर लेकर निकला होगा।

अनुराधा बेनीवाल की इस एकाकी यात्रा में आप ज्ञान से भारी नहीं होते, सफ़र से हलके होते हैं। न उसने कहीं ज्ञान जुटाने की ज्‍़यादा कोशिश की, और न पाठक को वह थाती सौंपकर अमर होने की। इसीलिए शायद यह पुस्तक यात्रा-वृत्‍तान्‍त नहीं, ख़ुद एक यात्रा हो गई है। एक सामाजिक, सांस्कृतिक यात्रा, और एक प्रश्न-यात्रा जो शुरू ही इस सवाल से होती है कि आख़ि‍र कोई भारतीय लड़की ‘अच्छी भारतीय लड़की’ के खाँचों-साँचों की पवित्र कुंठाओं के जाल को क्यों नहीं तोड़ सकती? सुदूर बाहर की इस यात्रा में वह भीतर के कई दुर्लभ पड़ावों से गुज़रती है, और अपनी संस्कृति, समाज और आध्यात्मिकता को लेकर कुछ इस अन्‍दाज़ में प्रश्नवाचक होती है कि अपनी हिप्पोक्रेसी को देखना हमारे लिए यकायक आसान हो जाता है।

ज़‍िन्‍दगी के अनेक ख़ुशनुमा चेहरे इस सफ़र में अनुराधा ने पकड़े हैं, और उत्सव की तरह जिया है। इनमें सबसे बड़ा उत्सव है निजता का। निजी स्पेस के सम्मान का जो उसे भारत में नहीं दिखा। अपने मन का कुछ कर सकने लायक़ थोड़ी-सी खुली जगह, जो इतने बड़े इस देश में कहीं उपलब्ध नहीं है। औरतों के लिए तो बिलकुल नहीं।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back, Paper Back
Publication Year 2016
Edition Year 2021, Ed. 2nd
Pages 188p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan - Sarthak
Dimensions 20.5 X 13.5 X 1.5
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Editorial Review

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Anuradha Beniwal

Author: Anuradha Beniwal

अनुराधा बेनीवाल

अनुराधा बेनीवाल का जन्म हरियाणा के रोहतक ज़‍िले के खेड़ी महम गाँव में 1986 में हुआ। इनकी 12वीं तक की अनौपचारिक पढ़ाई पिता श्री कृष्ण सिंह बेनीवाल की देखरेख में घर में ही हुई। 15 वर्ष की आयु में ये राष्ट्रीय शतरंज प्रतियोगिता की विजेता रहीं। 16 वर्ष की आयु में विश्व शतरंज प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उसके बाद इन्होंने प्रतिस्पर्धी शतरंज खेल की दुनिया से ख़ुद को अलग कर लिया, तब इनकी वर्ल्ड रैंकिंग 38 थी।

दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज से अंग्रेज़ी विषय में बी.ए. (ऑनर्स) करने के बाद अनुराधा ने भारती विद्यापीठ लॉ कॉलेज, पुणे से एलएलबी की पढ़ाई की। बाद में महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से अंग्रेज़ी विषय में एम.ए. भी किया। इस दौरान ये तमाम खेल गतिविधियों से कई भूमिकाओं में जुड़ी रहीं।

2013 में लन्दन जाने से पहले स्वावलम्‍बी अनुराधा ने अपनी बचत के पैसों से भारत के अलग-अलग हिस्सों में अकेले भ्रमण किया। लंदन जाने के बाद इन्होंने वहाँ के प्रतिष्ठित स्कूलों में शतरंज सिखाना शुरू किया। अभी वहाँ ये कई बड़े स्कूलों और रॉयल ऑटोमोबिल क्लब समेत कई और क्लब्स में भी शतरंज सिखाती हैं। साथ ही वहाँ कैम्ब्रिज के लिए ख़ुद भी शतरंज खेलती हैं।

अनुराधा एक समय अंग्रेज़ी अख़बार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के लिए ब्लॉग लिखा करती थीं। वे अंग्रेज़ी के कई ट्रैवल वेबसाइट्स के लिए भी अपने यात्रा-संस्मरण लिख चुकी हैं। इनके कुछ ब्लॉग पोस्ट्स कई बड़े समाचार पोर्टल्स की सुर्खियाँ बन चुके हैं। यूँ तो हिन्‍दी भाषा इनके अध्ययन का विषय नहीं रही, लेकिन इनकी पहली किताब हिन्‍दी में ही आई– ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’। यह उनकी घुमक्कड़ी के संस्मरणों की शृंखला ‘यायावरी आवारगी’ की भी पहली किताब है। इसमें वर्ष 2014 में इनके घूमे यूरोप के जिन 10 देशों का वर्णन है, वे हैं—फ़्रांस, बेल्जियम, हॉलैंड, जर्मनी, चेक रिपल्बिक, ब्रातिस्लावा, हंगरी, ऑस्ट्रिया और स्विट्जरलैंड। प्रेमचन्द, टॉलस्टॉय, दोस्तोयेव्‍स्की, एलिस वॉकर, टोनी मॉरिसन, कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा और झुम्पा लाहिरी आदि अनुराधा के पसन्‍दीदा लेखक हैं।

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