मेरे जैसे अध्येता के लिए यह कालावधि भूमंडलीकरण के प्रभाव की सबसे भयावह अवधि रही है। वह इसलिए कि विश्व व्यवस्था के इस नए परिवर्तन का प्रभाव अपने विविध रूपों के साथ खुलकर सामने आने लगा है; यहाँ तक कि उसने वैचारिक धरातल से नीचे उतरकर ज़मीनी सच्चाई को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।
आज का आदमी एक ऐसे दौर से गुज़र रहा है जिसमें इतिहास और संस्कृति ही नहीं, बल्कि वर्तमान से भी उसका रिश्ता अरूप होता चला जा रहा है। यह कम दुर्भाग्य की बात नहीं है कि इतिहास, विचार और साहित्य से लेकर मूल्यों तक की घोषणाएँ की जा रही हैं और हम उन घोषणाओं की वास्तविकता को परखने के बदले उनकी व्याख्या और बहस के लम्बे-चौड़े आयोजन करने में लगे हुए हैं। इस दौर में स्त्री, दलित और जनजातीय समाज लगातार बहस के केन्द्र में अपनी जगह बना रहे हैं। माना जा रहा है कि यह उत्तराधुनिकता से प्रेरित एक ऐसी परिघटना है, जिसमें पूरी सक्रियता के साथ जड़ों की ओर लौट रहे हैं तथा विकेन्द्रित परिस्थितियों का निर्णय करके अपने यथार्थ को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
स्त्री, दलित और जनजाति तीनों ने ही पूरी व्यवस्था के सामने कुछ असहज सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनमें कुछ इन वर्गों की पहचान से जुड़े हैं और कुछ इनकी स्वाधीनता, निर्णय के सम्मान और इनके स्वीकार से सम्बन्धित हैं। इसी सबके चलते पिछले वर्षों में मैंने विचार के स्तर पर अपने को सक्रिय भी अनुभव किया और परेशान भी। मुझे सोचने के लिए नए-नए रास्ते दिखाई दिए हैं।
—भूमिका से
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2012 |
| Edition Year | 2012, Ed. 1st |
| Pages | 120p |
| Publisher | Radhakrishna Prakashan |
| Dimensions | 22 X 14 X 1 |