Hindi Rashtravad

Sociology
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Hindi Rashtravad
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हिन्दी राष्ट्रवाद भारत की भाषाई राजनीति की एक चिंताकुल और सघन पड़ताल है, और यह पड़ताल होती है हिन्दी भाषा के मौजूदा स्वरूप तक आने के इतिहास के विश्लेषण के साथ।

जन की भाषा बनने की हिन्दी की तमाम क्षमताओं को स्वीकारते हुए किताब का ज़ोर यह समझने पर है कि वह हिन्दी जो अपनी अनेक बोलियों और उर्दू के साथ मिलकर इतनी रचनात्मक, सम्प्रेषणीय, गतिशीला और जनप्रिय होती थी, कैसे उच्च वर्ण हिन्दू समाज और सरकारी ठस्सपन के चलते इतनी औपचारिक और बनावटी हो गई कि तक़रीबन स्पन्दनहीन दिखाई पड़ती है! विशाल हिन्दीभाषी समुदाय की सृजनात्मक कल्पनाओं की वाहक बनने के बजाय वह संकीर्णताओं से क्यों घिर गयी! हिन्दुत्व की सवर्ण राजनीति की इसमें क्या भूमिका रही है, और स्वयं हिन्दीवालों ने अपनी कूपमंडूकता से उसमें क्या सहयोग किया है!

आज जब राष्ट्रवादी आग्रहों के और भी संकुचित और आक्रामक रूप हमारे सामने हैं, जिनमें भाषा के शुद्धिकरण की माँग भी बीच-बीच में सुनाई पड़ती है, इस विमर्श को पढ़ना, और हिन्दी के इतिहास की इस व्याख्या से गुज़रना ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है।

मूलत: अंग्रेज़ी में लिखित और बड़े पैमाने पर चर्चित इस किताब का यह अनुवाद स्वयं लेखक ने किया है, इसलिए स्वभावत: यह सिर्फ़ अनुवाद नहीं, मूल की पुनर्रचना है।

साथ ही पुस्तक में प्रस्तावित विमर्श की अहमियत को रेखांकित करने और उसे आज के संदर्भों से जोड़ने के मक़सद से समकालीन हिन्दी विद्वानों के दो आलेख भी शामिल किए गए है और लेखक से दो साक्षात्कार भी हैं जो इसके पाठकीय मूल्य को द्विगुणित कर देते हैं।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back, Paper Back
Publication Year 2022
Edition Year 2022, Ed. 1st
Pages 200p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 2
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Editorial Review

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Author: Alok Rai

आलोक राय

आलोक राय का जन्म 16 जुलाई, 1946 को जबलपुर, मध्यप्रदेश में हुआ। आपने 1966 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया। 1968-71 तक ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में रोड्स स्कॉलर रहे। वहाँ से लौटकर इलाहाबाद आए। 1977 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। उसके बाद कॉमनवेल्थ एकेडमिक स्टाफ़ स्कॉलरशिप पर यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन गए और 1982 में वहाँ से पी-एच.डी. की। 1991 में आई.आई.टी. दिल्ली में प्रोफ़ेसर नियुक्त हुए। 2002 में दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन शुरू किया। 1985-87 तक नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लायब्रेरी के फ़ेलो रहे। 1985 में आईसीएसएसआर के सीनियर फ़ेलोशिप से सम्मानित हुए।

ऑरवेल एंड द पॉलिटिक्स ऑफ़ डिस्पेयर और हिन्दी नेशनलिज़्म आपकी प्रमुख पुस्तकें हैं।

आप ताउम्र देश-विदेश में अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य पढ़ते-पढ़ाते रहे। अब दिल्ली विश्वविद्यालय से रिटायर होने के बाद इलाहाबाद में रह रहे हैं।

ईमेल : alokrai1@ gmail.com

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