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Kisan

Kisan

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  • Pages: 303p
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: KISAN170
  •  
    Digital Edition Available Instantly on Pajkamal Books Library on
    "किसान (अंग्रेजी में ‘दि पीजशेण्ट्री’ और ‘संस ऑफ दि सॉयल’ नाम से प्रकाशित) ‘ह्यूमन कामेडी’ शृंखला के अन्तिम चरण की रचना है। इसकी गणना बाल्जशक की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और परिपक्व कृतियों में की जाती है। बाल्जशक ने ‘ह्यूमन कामेडी’ की पूरी परियोजना के अन्तर्गत, अपने चार उपन्यासों में फ्रांसीसी ग्रामीण जीवन के अन्तरंग और बहिरंग को चित्रित करते हुए, सामन्ती भूमि-सम्बन्धों के पूँजीवादी रूपान्तरण तथा आधुनिक पूँजीवाद के विकास में कृषि की भूमिका को, पूँजीवाद के अन्तर्गत गाँव और शहर के बीच लगातार बढ़ती खाई को, छोटे मालिक किसानों पर सूदखोर महाजनों की जकड़बन्दी को, शहरी और ग्रामीण महाजनी के फर्क को, कृषि में माल-उत्पादन के बढ़ते वर्चस्व और किसानी जीवन पर मुद्रा के आच्छादनकारी प्रभाव को तथा किसान आबादी के विभेदीकरण (डिफरेंसिएशन) और कंगालीकरण को जिस अन्तर्भेदी गहराई और चहुँमुखी व्यापकता के साथ प्रस्तुत किया है, वह आर्थिक इतिहास या समाज-विज्ञान की किसी पुस्तक में भी देखने को नहीं मिलता। बाल्जशक शहरी मध्यवर्गीय रोमानी नजरिए से न तो कहीं ‘अहा, ग्राम्य-जीवन भी क्या है’ की आहें भरते नजर आते हैं, न ही उन ‘काव्यात्मक सम्बन्धों’ और पुरानी संस्थाओं- सम्बन्धों-चीजों के लिए बिसूरते दीखते हैं जिन्हें पूँजी या तो लील जाती है, या पुनःसंस्कारित करके अपना लेती है या फिर अजायबघरों में सुरक्षित कर देती है। इसके विपरीत वह ठहरे हुए ग्रामीण जीवन की कूपमंडूकतापूर्ण तुष्टि के प्रति वितृष्णा प्रकट करते हैं और उस मध्यवर्गीय शहरी नजरिए की खिल्ली उड़ाते हैं जिसे ग्राम्य जीवन एक खूबसूरत लैण्डस्कैप नजर आता है। एक ठण्डी वस्तुपरकता के साथ बाल्जशक गाँवों में व्याप्त पिछड़ेपन, अज्ञानता, विपन्नता, कूपमंडूकता, निर्ममता और उस अमानवीकरण की चर्चा करते हैं जो मंथर गति वाले अलग-थलग पड़े ‘स्वायत्तप्राय’ ग्रामीण परिवेश के अपरिहार्य गुण हैं और गाँवों में पूँजी का प्रवेश इन्हें और निर्मम-निरंकुश बनाने का काम ही करता है। पश्चिमी दुनिया में कृषि में पूँजीवाद का प्रवेश सबसे क्रान्तिकारी ढंग से फ्रांस और अमेरिका में हुआ। वहाँ के बूर्ज्वा जनवादी क्रान्ति के उत्तरकालीन परिदृश्य को चित्रित करते हुए बाल्जशक ने दिखलाया है कि ग्रामीण जीवन वहाँ भी लगभग ठहरा हुआ सा है, भविष्य को लेकर कहीं कोई उत्साह नहीं है, बाहरी दुनिया से नाम-मात्र का सम्पर्क है, नये विचारों का प्रभाव नगण्य है। खेतिहर मजदूर, छोटा मालिक किसान, रिटायर्ड फौजी - सभी आत्मविश्वास से रिक्त, रामभरोसे जी रहे हैं। खेतों में भरपूर हाड़ गलाने के बावजूद कुछ भी हासिल नहीं होता। गरीबी, भूमिहीनता, ऋणग्रस्तता, कुपोषण, बीमारी, गरीबी के चलते ऊँची जन्म दर और ऊँची मृत्यु दर - विशेषकर शिशु मृत्यु दर तथा अंधविश्वास और भाग्यवाद का चतुर्दिक बोलबाला है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की स्थिति के हर पहलू को तफसील से देखते हुए बाल्जशक किसान में समस्या के सारतत्त्व को पकड़ते हैं और बताते हैं कि सवाल भूस्वामित्व की सामन्ती व्यवस्था का नहीं है, बल्कि अपनेआप में भू-स्वामित्व की पूरी व्यवस्था का ही है। सामन्ती भूस्वामी की जगह पूँजीवादी फौजी जनरल या ऑपेरा गायिका के आ जाने से आम किसान की स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ता। किसान की खून-पसीने की कमाई के मुख्य अपहर्ता प्रायः सामने नहीं होते। वे बदलते रहते हैं, पर किसानों का रोजमर्रे के जीवन में जिन बिचौलियों से साबका पड़ता है, उनकी स्थिति अपरिवर्तित रहती है। किसान उपन्यास में बाल्जशक रिगू-गोबर्तें गठजोड़ के रूप में व्यापारी-भूस्वामी- सूदखोर गठजोड़ की किसानों पर चतुर्दिक जकड़बन्दी की तस्वीर उपस्थित करते हैं और दिखलाते हैं कि किस तरह प्रशासन, न्याय, ऋण और व्यापार के पूरे तंत्र पर इस गिरोह का ऑक्टोपसी नियंत्रण कायम है। स्वयं बाल्जशक के ही शब्दों में: ‘‘छोटे किसान की त्रासदी यह है कि सामन्ती शोषण से मुक्त होकर वह पूंजीवादी शोषण के जाल में फँस गया है।’’ ख्सम्पादकीय आलेख से

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    Honore De Balzac

    ओनोरे द बाल्ज़ाक

    जन्म: मई, 1799; तूर (फ्रांस)। मृत्यु: 1850; पेरिस (फ्रांस)।

    फ्रांसीसी क्रान्ति और उत्तरवर्ती दशक की उथल-पुथल के दौरान किसान से शहरी मध्यवर्गीय बने परिवार में जन्म। शिक्षा-दीक्षा पेरिस के कालेज द वान्द्रोम और पेरिस लॉ स्कूल में। शुरू में छद्म नामों से आठ उपन्यास प्रकाशित कराए, पर सभी असफल रहे। कुछ वर्ष व्यवसाय में हाथ आजमाया और कर्ज में डूब गए। ‘दि वाइल्ड एसे’ज़ स्किन’ उपन्यास (1830-31) से लेखन की दुनिया में सफल वापसी। 1834 में ‘फादर गोरियो’ उपन्यास के प्रकाशन के साथ ही उपन्यासों-कहानियों की वृहत शंृखला की योजना जिसे 1842 में ‘ह्यूमन कामेडी’ का नाम दिया। 1845 में 144 उपन्यासों की पूरी सूची प्रकाशित कराई और इसे पूरा करने में जी-जान से जुट गए। दिन-रात की मेहनत से शरीर छीजता चला गया और 1850 में मात्र 51 साल की उम्र में मृत्यु। 144 उपन्यासों का सपना पूरा न हो सका पर ‘ह्यूमन कामेडी’ के अंतर्गत रचे गए कुल नब्बे उपन्यासों-उपन्यासिकाओं और कहानियों में पसरा उनका कृतित्व उन्नीसवीं शताब्दी के पहले पाँच दशकों के दौरान सामंतवाद की पुनर्स्थापना के प्रयासों से लेकर पूंजीवादी व्यवस्था, संस्कृति एवं सामाजिक मनोविज्ञान के विकास के विविध पक्षों का प्रामाणिक दस्तावेज बन गया।

    गोबसेक, यूज़ीन ग्रांदे, दि नुसिंजेन हाउस, दि पीजेण्ट्स, कज़िन पोंस, लॉस्ट इल्यूजन्स, ए डॉटर ऑफ ईव, स्टडी ऑफ ए वुमन, दि मिडिल क्लासेज़, फादर गोरियो, दिन थर्टीन, दि शुआन्स जैसे उपन्यासों में बाल्ज़ाक ने ‘फूहड़ धनिक नौबढ़ों’ के प्रभाव में अपना मान-सम्मान खो देने वाले अभिजातों, चतुर-चालाक डीलरों व अन्य महत्त्वाकांक्षी लोगों और साथ ही उनके शिकार बननेवालों; लूट के वैधीकरण, विश्वासघात और घृणित षड्यंत्रों, मृत्यु और निष्क्रिय जीवन के बीच अपना विकल्प चुनते युवा और नैतिक अधःपतन, कला की वेश्यावृत्ति तथा खरीदने-बेचने के सिद्धान्तों के वर्चस्व से पारिवारिक और निजी सम्बन्धों में पैदा होनेवाली अनन्त त्रासदियों को पटुता के साथ कथाबन्धों में बाँधकर न केवल उस युग का ‘प्रकृत इतिहास’ लिख दिया, बल्कि मुनाफा, माल-उत्पादन और मुद्रा के वर्चस्व की दुनिया के सारतत्व को उद्घाटित करने में अद्वितीय सफलता हासिल की।

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