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Kala Ke Samajik Udgam

Kala Ke Samajik Udgam

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  • Pages: 208p
  • Year: 2003
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126723041
  •  
    कला-साहित्य-संस्कृति के प्रश्नों पर प्लेखानीय की कृतियों में सर्वोपरि और सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं ‘असम्बोधित पत्रा’ और ‘कला और सामाजिक जीवन’। कला और साहित्य पर प्लेखानोव की ज्यादातर कृतियों का मुख्य उद्देश्य कला और इसकी सामाजिक भूमिका को भौतिकवादी दृष्टि से प्रमाणित करना था। इन कृतियों में ‘बेलिस्की की साहित्यिक दृष्टि’ (1897), ‘चेर्निशेव्स्की का सौन्दर्यशास्त्राीय सिद्धान्त’ (1897), ‘असम्बोधित पत्रा’ (1890-1900), ‘अठारहवीं सदी के फ्रेंच नाटक और चित्राकला पर समाजशास्त्राीय दृष्टिकोण से एक नजर’ (1905) तथा ‘कला और सामाजिक जीवन’ (1912) प्रमुख हैं। कलात्मक सृजन को वस्तुगत जगत से स्वतंत्रा माननेवाले और कला को मानवात्मा की अन्तर्भूत अभिव्यक्ति बताने वाले प्रत्ययवादी सौन्दर्यशास्त्रिायों के विपरीत प्लेखानोव ने दर्शाया कि कला की जड़ें वास्तविक जीवन में होती हैं और यह सामाजिक जीवन से ही निःसृत होती है। कला और साहित्य की एक वैज्ञानिक, मार्क्सवादी समझ विकसित करने का प्रयास उनकी सभी कृतियों की विशिष्टता है। ‘कला, कला के लिए’ के विचार को प्लेखानोद ने तीखी आलोचना की। उन्होंने दर्शाया कि यह विचार उन्हीं दौरों में उभरकर आता है जब लेखक और कलाकार अपने इर्द-गिर्द की सामाजिक दशाओं से कट जाते हैं। यह विचार हमेशा ही प्रतिक्रियावादी शासक वर्गों की सेवा करता है लेकिन जब समाज में वर्ग-संघर्ष तीखा होता है तो शासक वर्ग और उसके विचारक खुद ही इस विचार को छोड़ देते हैं और कला को अपने कबचाव के एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश करने लगते हैं।

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    Georgi Plekhanov


    गिओगीं बलेन्तिनोविच प्लेखानोव
    जन्म - 29 नवम्बर 1856, रूस के लिपस्की ओब्लास्त  (उपप्रान्त) का गुदालोव्‍का गाँव । निधन : 3० मई, 1918, तेरिओकी, लेनिनग्राद ओब्लास्त, रूस ।
    मार्क्सवादी दर्शन के इतिहास की कल्पना प्लेखानोव के बिना नहीं की जा सकती । उन्होंने मार्क्सवाद के प्रचारक, भाष्यकार और व्याख्याकार की ही भूमिका नहीं निभायी, बल्कि एक मौलिक चिन्तक के रूप में मार्क्सवादी दर्शन को विकसित भी किया । इस तथ्य से भी कम ही लोग परिचित होंगे कि मार्क्स की विचारधारा को द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद नाम प्लेखानोव ने ही दिया था ।
    दर्शन और राजनीति विषयक कृतियों के अलावा प्लेखानोव ने ही सबसे पहले मार्क्सवादी नजरिये से साहित्य और सौन्दर्यशास्त्र की समस्याओं पर सुसंगत ढंग से विचार किया । सामाजिक जीवन से कला के अन्तर्सम्बन्धों पर, कला के सामाजिक स्रोतों पर, वर्ग समाज में कला की भूमिका पर और पूँजीवादी समाज में कला के पराभव पर मार्क्सवादी अवस्थिति को जिस व्यक्ति ने सबसे पहले सूत्रबद्ध किया वह प्लेखानोव ही थे । उन्हें कला-साहित्य की मार्क्सवादी वैचारिकी के सूत्रधार के रूप में देखा जा सकता है ।
    कला-सिद्धान्त और साहित्यालोचना के मार्क्सवादी आधार की प्लेखानोव की तलाश नरोदवादियों और 'डिकेडेण्ट'' कवियों के विचारों के विरुद्ध, मनोगतवाद के तमाम रूपों के विरुद्ध संघर्ष से शुरू हुई । यथार्थवादी साहित्य के लिए उनका लम्बा संघर्ष सौन्दर्यशास्त्र सम्बन्धी उनके विचारों की विशिष्टता है । अपने कला सिद्धान्त के भौतिकवादी आधार की जमीन पर खड़े होकर उन्होंने कलात्मक यथार्थवाद की लगातार हिफाजत की । भौतिकवादी सौन्दर्यशास्त्र की परम्परा की हिफाजत करते और उसे विकसित करते हुए प्लेखानोव का मानना था कि यथार्थ की प्रामाणिक प्रस्तुति कला का मुख्य मानदण्ड और इसका प्रमुख गुण है । वह लगातार इस बात पर बल देते रहे कि यथार्थ ही कला का मुख्य स्रोत है ।

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