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Unmad

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  • Pages: 343p
  • Year: 1999
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8171787517
  •  
    सांप्रदायिक उन्माद को उन्माद की ही एक किस्म के रूप में पकड़ने की कोशिशें हिंदी में बहुत कम हुई हैं-उँगलियों के पोरों पर भी नहीं, सिर्फ उंगलियों पर गिनने लायक । भगवान सिंह का यह उपन्यास शायद पहली बार इतने सारे मानवीय ब्यौरों में जाकर यह काम कर रहा है । दूसरे तमाम पहलू छोडू भी दें तो इसका यह महत्त्व दस्तावेजी किस्म का है । एक सहज, प्यारी-सी प्रेमकथा हमारे असहज समाज में इतने सारे टकरावों का केंद्र बन जाती है और यह अकेली गुत्थी सुलझाने के क्रम में इतनी सारी उलझी गुत्थियाँ रफ्ता- रफ्ता सुलझती जाती हैं कि ताज्जुब होता है । सांप्रदायिकता जैसी जटिल समस्या को महज कुछ साजिशों के जरिए व्याख्यायित करने का चलन कम-से- कम साहित्य में नहीं चलते रहना चाहिए । साहित्य तो चीजों को ज्यादा ठोस ढंग से, ज्यादा गहराई में और ज्यादा व्यौरेवार पकड़ता है । साहित्य पर यही भरोसा गेटे से कहलवाता है, 'सारे सिद्धांत धूसर पड़ जाते हैं पर जीवन का वृक्ष हमेशा हरा रहता है ।' सांप्रदायिकता की एक गहरी समझ पर केंद्रित इस उपन्यास में आपको जीवन वृक्ष की हरियाली मिलेगी, उसे समझने के दशकों पुराने धूसर सिद्धांत नहीं । एक बड़ी चुनौती यह उपन्यास हमारे सामने रखता है-अपने समाज के असहज पहलू को नए सिरे से समझने की चुनौती । अगर आप यह मानकर चलें कि आप दिमागी गुत्थियों से भरे एक असहज समाज में जी रहे हैं तो अनजाने में की गई अपनी ऐसी कई हरकतों से बच सकते हैं, जो किसी को गहरा दुख पहुँचानेवाली और यहाँ तक कि कुछ बड़े विध्वंसों का कारण भी बन सकती हैं । प्रौढ़ता और संवेदना के अद्‌भुत तालमेल से जनमी यह रचना हमें पहले से ज्यादा प्रौढ़, ज्यादा संवेदनशील बना सकने में सक्षम है ।

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    Bhagwan Singh

    जन्म : 1931 में गोरखपुर जनपद के गगहा गाँव में। साहित्य की विविध विधाओं में लेखन। उनका शोधपरक लेखन इतिहास और भाषा के क्षेत्र में रहा है।

    प्रकाशित कृतियाँ : काले उजले टीले (1964); महाभिषग (1973); अपने अपने राम (1992); परम गति (1999); उन्माद (2000); शुभ्रा  (2000); अपने समानान्तर (1970); इन्द्र धनुष के रंग (1996)।

    शोधपरक रचनाएँ : स्थान नामों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन (अंशत: प्रकाशित, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, 1973); आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता (1973); हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य, दो खंडों में (1987); दि वेदिक हड़प्पन्स (1995); भारत तब से अब तक (1996); भारतीय सभ्यता की निर्मिति (2004); भारतीय परंपरा की खोज (2011); प्राचीन भारत के इतिहासकार (2011); कोसंबी : मिथक और यथार्थ (2011)।

    सम्प्रति : 'ऋग्वेद की परम्परा’ पर धारावाहिक लेखन, 'नया ज्ञानोदय’ में।

    संपर्क : ए-6 सिटी अपार्टमेंट, वसुंधरा एन्क्लेव, दिल्ली-110034

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