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Bharat Ke Madhya Varg Ki Ajeeb Dastan

Bharat Ke Madhya Varg Ki Ajeeb Dastan

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  • Pages: 209p
  • Year: 2009
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126716388
  •  
    भारत के मध्य वर्ग की अजीब दास्तान भारत 1991 में जैसे ही आर्थिक सुधारों और भूमंडलीकरण की डगर पर चला, वैसे ही इस देश के मध्य वर्ग को एक नया महत्त्व प्राप्त हो गया। नई अर्थनीति के नियोजकों ने मध्य वर्ग को ‘शहरी भारत’ के रूप में देखा जो उनके लिए विश्व के सबसे बड़े बाजारों में से एक था। एक सर्वेक्षण ने घोषित कर दिया कि यह ‘शहरी भारत अपने आप में दुनिया के तीसरे सबसे बड़े देश के बराबर है।’ लेकिन, भारतीय मध्य वर्ग कोई रातोंरात बन जाने वाली सामाजिक संरचना नहीं थी। उपभोक्तावादी परभक्षी के रूप में इसकी खोज किए जाने से कहीं पहले इस वर्ग का एक अतीत और एक इतिहास भी था। भारत के मध्य वर्ग की अजीब दास्तान में पवन कुमार वर्मा ने इसी प्रस्थान बिंदु से बीसवीं शताब्दी में मध्य वर्ग के उद्भव और विकास की विस्तृत जाँच-पड़ताल की है। उन्होंने आजादी के बाद के पचास वर्षों को खास तौर से अपनी विवेचना का केंद्र बनाया है। वे आर्थिक उदारीकरण से उपजे समृद्धि के आशावाद को इस वर्ग की मानसिकता और प्रवृत्तियों की रोशनी में देखते हैं। उन्होंने रातोंरात अमीर बन जाने की मध्यवर्गीय स्वैर कल्पना को नितांत गरीबी में जीवनयापन कर रहे असंख्य भारतवासियों के निर्मम यथार्थ की कसौटी पर भी कसा है। मध्य वर्ग की यह अजीब दास्तान आजादी के बाद हुए घटनाक्रम का गहराई से जायजा लेती है। भारत-चीन युद्ध और नेहरू की मृत्यु से लेकर आपातकाल व मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा तक इस दास्तान में मध्य वर्ग एक ऐसे खुदगर्ज तबके के रूप में उभरता है जिसने बार-बार न्यायपूर्ण समाज बनाने के अपने ही घोषित लक्ष्यों के साथ गद्दारी की है। लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया के प्रति मध्य वर्ग की प्रतिबद्धता दिनोंदिन कमजोर होती जा रही है। मध्य वर्ग ऐसी किसी गति- विधि या सच्चाई से कोई वास्ता नहीं रखना चाहता जिसका उसकी आर्थिक खुशहाली से सीधा वास्ता न हो। आर्थिक उदारीकरण ने उसके इस रवैये को और भी बढ़ावा दिया है। पुस्तक के आखिरी अध्याय में पवन कुमार वर्मा ने बड़ी शिद्दत के साथ दलील दी है कि कामयाब लोगों द्वारा समाज से अपने आपको काट लेने की यह परियोजना भारत जैसे देश के लिए खतरनाक ही नहीं बल्कि यथार्थ से परे भी है। अगर भारत के मध्य वर्ग ने दरिद्र भारत की जरूरतों के प्रति अपनी संवेदनहीनता जारी रखी तो इससे वह भारी राजनीतिक उथल-पुथल की आफत को ही आमंत्रित करेगा। किसी भी राजनीतिक अस्थिरता का सीधा नुकसान मध्य वर्ग द्वारा पाली गई समृद्धि की महत्त्वाकांक्षाओं को ही झेलना होगा। भारत के मध्य वर्ग की अजीब दास्तान आज के जमाने पर एक गहरी निगाह डालते हुए उसकी प्रभावशाली आलोचना प्रस्तुत करती है। आजादी की स्वर्ण जयंती के बाद लिखी गई सर्वाधिक चर्चित पुस्तकों में से एक यह रचना समकालीन समाजशास्त्रीय साहित्य में एक अनूठा योगदान मानी जा चुकी है।

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    Pawan Kumar Verma

    जन्म : 1953 में नागपुर में।

    शिक्षा : दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से इतिहास में ऑनर्स करने के बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की। भारतीय विदेश सेवा के सदस्य के रूप में बल्गारिया व रोमानिया में नियुक्ति के अलावा पवन कुमार वर्मा ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र स्थित भारतीय मिशन में भी महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व का निर्वहन किया। वे मास्को स्थित भारतीय दूतावास के जवाहरलाल नेहरू सांस्कृतिक केन्द्र के निदेशक और भारतीय विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता भी रहे।

    प्रकाशित कृतियाँ : द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास (यह किताब राजकमल प्रकाशन से भारत के मध्य वर्ग की अजीब दास्तान शीर्षक से प्रकाशित है); अन्य किताबें—गालिब : द मैन, द टाइम्स, कृष्णा : द प्लेफुल डिवाइन, युधिष्ठिर एंड द्रौपदी : ए टेल ऑव लव, पेशन एंड रिडिल्स ऑव एक्जिस्टेंस, मेशंस एट डस्क : द हवेलीज ऑव ओल्ड डेलही, बीइंग इंडियन इनसाइड दि रियल इंडिया और बिकमिंग इंडियन दि अनफिनिश्ड रेवोल्यूशन ऑव कल्चर एंड आइडेंटिटी।

    सम्प्रति : बिहार के मुख्यमंत्री के सांस्कृतिक सलाहकार।

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