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Shyam Swapn

Shyam Swapn

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  • Pages: 116p
  • Year: 2001
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126702117
  •  
    यह एक विचित्र संयोग ही कहा जाएगा कि जिस अंचल में रहकर बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में गजानन माधव मुक्तिबोध जैसे आधुनिक चिंतक-कवि ने अपने समय के खुरदुरे और अदम्य यथार्थ के लिए फंतासी की विधि का आविष्कार किया उसी अंचल के ठाकुर जगन्मोहन सिंह ने उन्नीसवीं शताब्दी के अंत के कुछ बरसों पहले एक पूरा उपन्यास ही फंतासी के रूप में लिखा । हिंदी में यथार्थ के चित्रण की जो इकहरी परंपरा बाद में लगभग केंद्रीय बन गई उसमें इस उत्तराधिकार का कोई बोध या स्मृति, दुर्भाग्य से, शेष नहीं है । उपन्यास की गल्पता को हिंदी में इतनी जल्दी साध लिया गया था और उसे अपनी जातीय परंपरा के अनुकूल भी कर लिया गया था यह जानना आज के स्मृतिवंचित दौर में रोमांचक हे । इस अनोखे गद्य में मध्यकालीन कविता 'स्वच्छंद' है : उस पर सचाई का व्यर्थ का बोझ नहीं है बल्कि सपने की सहज प्रवाहमयता है । वह खिलता, स्पंदित, कविसमयों में विन्यस्त ऐसा गद्य है कि विशेषत: आज ता सर्वथा अनन्य लगता है । श्यामास्वप्‍न का पुनर्प्रकाशन सचमुच एक साहित्यिक घटना है । शायद इसका एक और साक्ष्य कि कैसे कई मायनों में उत्तर-आधुनिक हमारे यहाँ प्राक्-आधुनिक है । -अशोक वाजपेयी

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    Thakur Jaganmohan Singh

    ठाकुर जगन्मोहन सिंह

    ठाकुर जगन्मोहन सिंह का जन्म 1857 में, विजयराघवगढ़ (म.प्र.) में हुआ। पिता सरजूप्रसाद सिंह को ऐतिहासिक स्वतंत्रता-संग्राम में हिस्सा लेने के कारण कालेपानी की सजा हुई थी। कहा जाता है कि दंड भोगने के स्थान पर उन्होंने अपने प्राण अपने आप ले लिए।

    ठाकुर जगन्मोहन सिंह की शिक्षा वाडर््स इंस्टीट्यूशन, बनारस में हुई। वहाँ वे बारह वर्ष रहे। हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी भाषा और साहित्य का अध्ययन किया। 1880 में उनकी नियुकित तहसीलदार के पद पर सेंट्रल प्राविन्स में हुई। इस पर वे धमतरी और शिवरीनारायण में रहे। देश भ्रमण किया।

    भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की सक्रियता से बनारस मंे बने रचनात्मक परिवेश का सम्पर्क जगन्मोहन सिंह के लिए निरन्तर प्रेरक रहा। भारतेन्दु के साथ जीवनव्यापी मैत्री से उन्होंने बहुत कुछ सीखा-पाया। मूलतः कवि ठाकुर जगन्मोहन सिंह की श्यामालता (1885), प्रेम संपत्तिलता (1885) तथा श्यामासरोजनी (1887) जैसी काव्य-कृतियांॅ प्रेम के उदग्र अनुभवों का उत्कट साक्ष्य हैं। प्रकृति के प्रति गहरा अनुराग उनके कृतित्व को एक अतिरिक्त महत्व भी देता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसे रेखांकित करते हुए लिख है- ‘‘बाबू हरिश्चन्द्र, पं. प्रतापनारायण मिश्र आदि कवियों और लेखकों की दृष्टि और हृदय की पहंॅुच मानव-क्षेत्र तक ही थी, प्रकृति से अपर क्षेत्रों तक नहीं। पर ठाकुर जगमोहनसिंह ने नरक्षेत्र के सौन्दर्य को प्रकृति के और क्षेत्रों के सौन्दर्य के मेल में देखा है। प्राचीन संस्कृत साहित्य के रुचि-संसार के साथ भारत भूमि की प्यारी रूप-रेखा को मन में बसानेवाले वे पहले हिन्दी लेखक थे।’’

    ठाकुर जगन्मोहन सिंह ने मेघदूत, ऋतुसंहार तथा देवयानी में महाभारत के आदि पर्व 73 से 85 सर्गों तक का अनुवाद किया है। बायरन की प्रियजनर ऑफ शिलन का भी अनुवाद उन्होंने किया। उनकी अप्रकाशित डायरी में हुक्के वाला नाटक नामक 1886 में लिखा 4 अंकों का एक प्रहसन भी प्राप्त होता है जिसका प्रकाशन साक्षात्मकार के जून-जुलाई 1984 के अंक में हुआ है।

    ठाकुर जगन्मोहन सिंह का निधन 4 मार्च 1899 को सुहागपुर (म.प्र.) में हुआ।

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