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Pavallai

Pavallai

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  • Pages: 127p
  • Year: 2001
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126702044
  •  
    समाजवादी विचारधारा के जाने-माने तमिल उपन्यासकार कु. चिन्नप्प भारती की कृति पवलाई उनकी अन्य रचनाओं से अलग पहचान रखती है, कथा और वस्तु-शिल्प दोनों के लिहाज से । इसमें वर्ग संघर्ष या मजदूर समस्याओं को नहीं उछाला गया है, प्रत्युत अपने सच्चे प्रेम को शाश्वत बनाने के लिए एक नारी द्वारा छेड़ी गई जबर्दस्त मुहिम इसका केन्द्रबिन्दु है । जाति-बिरादरी के निहित स्वार्थों के चलते प्रेमी को छोड्‌कर पड़ोसी गाँव के पेरियण्णन का हाथ पकड़ने को मजबूर पवलाई मन-मंदिर में प्रेमी .को देवता के रूप में स्थापित करके गृहस्थी के जुए को कंधे पर ढोते हुए समर्पित पत्नी और कुशल गृहिणी के रूप में पति और गाँववालों का मन मोह लेती है । गाँव में प्रेमी लकवा का शिकार होता है तो उसे सहारा देने के लिए पति को तज देती है । इधर शादी के चंद महीनों बाद पवलाई के पिछले प्रेम के बारे में जान लेने पर भी पेरियण्णन इसी प्रत्याशा से मन ही मन उसे क्षमा कर देता है कि वह अबोध अवस्था की सहज दुर्बलता थी जो दुहराई नहीं जाएगी । बचपन से ही अनाथ और जीवन-संघर्षों से अनुभव-प्राप्त पेरियण्णन इतना सुलझा हुआ है कि पत्नी की निष्ठा पर कभी सवाल नहीं उठाता । किन्तु देस साल की सुखमय गृहस्थी पवलाई के साहसिक कदम के कारण ताश के घर के समान चरमरा जाती हे । परियण्णन हताश तो होता है, पर मानसिक सन्तुलन नहीं खोता । पत्नी द्वारा बुरा-भला कहने पर भी उत्तेजित नहीं होता । पवलाई के व्यंग्य-बाणों को .अपने तर्कों से निरस्त करता वह सीधा-सादा गृहस्थ विदेहराज जनक की दार्शनिकता और युधिष्ठिर की क्षमाशीलता को भी मात कर देता है । उसके जीवन में विधवा तंकम्मा का प्रवेश परिस्थितिजन्य था और यह उजास भी अल्पकालिक ही रही । विधवा नारी के दाम्पत्य जीवन के प्रति समाज के कटाक्ष और विधवा पुत्र को हेय दृष्टि से देखने की कुटिल मनोवृत्ति को सहन न कर पाने से तंकम्मा अपने जीवन का अन्त कर लेती है और यों पेरियण्णन के जीवन में फिर से अँधेरा छा जाता है । समाज के इन अर्थहीन आचार-विचारों से विरक्त पेरियण्णन अपने आड़े वक्तों में साथ देनेवाले दलित नौकर रामन को अपनी जायदाद का वारिस घोषित करते हुए अपने आपको भी उसी को सौंप देता है । इस तरह तीन-चार पात्रों के मानसिक संघर्षो के बारी-बारी से चित्रण के चलते एक पूरा समाज अपनी आस्थाओं और अन्धविश्वासों के साथ पाठक के सामने साकार होता है...

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    K. Chinnappa Bharti

    कु. चिन्नप्प भारती

    जन्म: 1935, पोन्नेरिपट्टी, नामक्कल, सेलम (तमिलनाडु)।

    हाईस्कूल की पढ़ाई के समय से ही छात्र-आन्दोलनों से सम्बद्ध। समाजवादी सिद्धान्तों के प्रति रुझान के चलते चेन्नई के पच्चैयपान कालेज में इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान स्टुडेंट्स फेडरे़ान ऑफ इंडिया के प्रमुख नेता। 1955 में इंडोनेशिया की राजधानी बांडुंग मंे आयोजित अफ्रीकी-एशियाई शान्ति सम्मेलन में तमिलनाडु छात्र-संघ के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। 1957 में मास्को में आयोजित राष्ट्रीय युवा सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व। इंटर के बाद पढ़ाई छोड़कर सक्रिय राजनीति में प्रवेश। 1958 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सदस्य बने। पार्टी के टिकट पर नामक्कल नगर के पार्षद चुने गए। पार्षद के रूप में कोल्लीमलै के पहाड़ी क्षेत्रों में जाकर गिरिजनों और जनजाति के लोगों के बीच काम करने और उनकी समस्याओं को जानने का अवसर मिला। 1976 में आपातकाल के दौरान एक वर्ष का कारावास।

    तमिलनाडु प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव (1976) के रूप में तथा सी.आई.टी.यू. मजदूर संघ के अध्यक्ष के रूप में चिन्नप भारती के बुद्धिजीवियों और जनसाधारण के साथ घुलने-मिलने के अवसर मिलते रहे जिसके फलस्वरूप वे सशक्त उपन्यासों की रचना में सफल हुए।

    कुछ समय तक मासिक साहित्यिक-सामाजिक पत्रिका ‘चेम्मलर’ के प्रबंध सम्पादक रहे।

    रचनाएँ:

    कविता-संग्रह: चिन्नप्प भारती की कविताएँ (1954), निलवुडै मै एॅप्पो? (भूस्वामित्व कब?; 1954)।

    कहानी-संग्रह: चिन्नप्प भारतियिन् कुट्टि कदैगल (1954)।

    उपन्यास: दाहम, संगम, शर्करा, पवलाइ।

    प्रशस्ति और पुस्कार: उपन्यास ‘संगम’ पर इलक्किय चिंतनै पुस्कार (1985), वर्ष का श्रेष्ठ उपन्यास पुरस्कार (1985), उपन्यास ‘दाहम’ प्रथम दस श्रेष्ठ उपन्यासों में परिगणित। चिन्नप्प भारती की रचनाएँ अंग्रेजी, तेलुगु, मलयालम, हिन्दी आदि भाषाओं में अनूदित हुई हैं।

    सम्पर्क: 16, तमिल संगम मार्ग, गणेशपुरम, नामक्कल-637001, सेलम जिला (तमिलनाडु)।

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