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Katha Samay Mein Teen Hamsafar

Katha Samay Mein Teen Hamsafar

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  • Pages: 216
  • Year: 2011, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126720750
  •  
    Digital Edition Available Instantly on Pajkamal Books Library on
    अलग परिवेश और पृष्ठभूमियों से आर्इं हिन्दी की तीन शीर्षस्थ लेखिकाएँ जिन्होंने बिना किसी आन्दोलनात्मक तेवर के और बगैर किसी आन्दोलनकारी समूह के सहयोग के, पाठकों के संसार में अपनी जगह बनाई । उन्होंने हमें अनेक कालजयी रचनाएँ दीं । उनसे हमारी उम्मीदें अभी भी बरकरार हैं । कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी और उषा प्रियंवदा–नई कहानी के आरम्भिक दौर में, लेकिन नई कहानी आन्दोलन की छाया से बाहर अपनी निजी शैली, और अपने विशिष्ट तेवर के साथ अपनी पहचान बनाने वाले तीन बड़े नाम । यह पुस्तक इन तीनों की सहगामी, मित्र और गम्भीर पाठक रहीं प्रसिद्ध आलोचक निर्मला जैन द्वारा इनकी बुनत, उनके पाठ की बनावट और कृतियों के वैशिष्ट्य को समझने का प्रयास है । निर्मला जी का कहना है % ‘‘कुल जमा किस्सा यह कि ‘नई कहानी’ को सुनियोजित आन्दोलन के रूप में चलाने की योजना जिन लोगों ने बनाई उन्हीं के समानान्तर बिना किसी आन्दोलनात्मक तेवर या मुद्रा अख्तियार किए, ये तीनों महिलाएँ पूरी निष्ठा और समर्पित मनोभाव से कहानियाँ लिख रही थीं ।’’ ‘‘उन्होंने कभी कोई परचम नहीं लहराया, सैद्धान्तिक फिकरेबाजी नहीं की । ‘स्त्रीवाद’ या ‘महिला लेखन’ के नाम पर कोई आरक्षित वर्ग खड़ा नहीं किया । किसी अतिरिक्त रियायत की अपेक्षा नहीं की ।’’ ऐसी आत्मसम्भवा रचनाकारों पर उतनी ही बेबाक और स्वतंत्र चिंतक निर्मला जैन की यह पुस्तक इन कृतिकारों के विषय में सोचने–समझने के लिए प्रस्थान बिन्दु बनेगी, ऐसा हमारा विश्वास है । नई कहानी दौर की एक विशिष्ट कथा–त्रयी की रचनात्मकता पर एक मानक कलम से उतरी अनूठी आलोचना कृति ।

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    Dr. Nirmala Jain

    हिन्दी की जानी-मानी आलोचक निर्मला जैन का जन्म सन् 1932 में दिल्ली के व्यापारी परिवार में हुआ। बचपन में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण आरम्भिक जीवन संघर्षपूर्ण रहा। इसके बावजूद उन्होंने दिल्ली में ही शिक्षा पूरी की और वर्षों कत्थक गुरु अच्छन महाराज (बिरजू महाराज के पिता) से नृत्य की शिक्षा प्राप्त की। विवाह से पहले बी.ए. तक और विवाह के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से ही उन्होंने एम.ए., पी-एच.डी. और डी.लिट् की उपाधियाँ प्राप्त कीं।

    लेडी श्रीराम कॉलेज (1956-70) और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग (1970-96) में अध्यापन करके सेवानिवृत्त होने के बाद भी, वे विशेष आमंत्रित रूप से दस वर्ष तक अध्यापन करती रहीं। इस दौरान वे हिन्दी विभाग की अध्यक्ष (1981-84) और अनेक वर्ष तक दक्षिण-परिसर में विभाग की प्रभारी प्रोफेसर रहीं।

    अध्यापन के दौरान उन्होंने बड़ी संख्या में शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया। साथ ही अनेक महत्त्वपूर्ण आलोचना कृतियों की रचना की और प्रसिद्ध कृतियों के अनुवाद किए। महादेवी और जैनेन्द्र की रचनावलियों के अतिरिक्त कई पुस्तकों का संचयन और सम्पादन भी किया। इन मौलिक, अनूदित और सम्पादित रचनाओं की संख्या तीस से अधिक है। अपने जीवन और समय का जायज़ा उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘ज़माने में हम’ में लिया है।

    निर्मला जैन एक ऐसा सुपरिचित नाम हैं जिन्होंने अपनी वस्तुनिष्ठ आलोचना-दृष्टि और बेबाक अभिव्यक्ति से हिन्दी के पुरुष-प्रधान आलोचना-परिदृश्य में उल्लेखनीय जगह बनाई है। उनके अनेक शिष्य महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं।

    खास बात यह है कि आज भी वे पूरी लगन और निष्ठा से अध्ययन और रचना-कर्म में संलग्न हैं और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय योगदान दे रही हैं।

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