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Hindi Kahani Ki Ikkisavin Sadi

Hindi Kahani Ki Ikkisavin Sadi

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  • Pages: 232
  • Year: 2019, 1st Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9789388753876
  •  
    लम्बे-लम्बे अन्तराल पर तीन-चार कहानियां ही मैं लिख पाया, पर लिखने की ललक बनी रही जिसने यह गौर करनेवाली निगाह दी कि अच्छी कहानी में अच्छा क्या होता है, कहानियां कितने तरीकों से लिखी जाती हैं, वे कौन-कौन-सी युक्तियाँ हैं जिनसे विशिष्ट प्रभाव पैदा होते हैं, कोई सम्भावनाशाली कथा-विचार कैसे एक खराब कहानी में विकसित होता है और एक अति-साधारण कथा-विचार कैसे एक प्रभावशाली कहानी में ढल जाता है इत्यादि | लेकिन जब आप एक कहानीकार पर या किसी कथा-आन्दोलन पर समग्र रूप में टिप्पणी कर रहे होते हैं, तब ‘ज़ूम-आउट मोड’ में होने के कारण रचना-विशेष में इस्तेमाल की गई हिकमतों, आख्यान-तकनीकों, रचना के प्रभावशाली होने के अन्यान्य रहस्यों और इन सबके साथ जिनका परिपाक हुआ है, उन समय-समाज-सम्बन्धी सरोकारों के बारे में उस तरह से चर्चा नहीं हो पाती। कहीं समग्रता के आग्रह से विशिष्ट की विशिष्टता का उल्लेख टल जाता है तो कहीं साहित्यालोचन को प्रवृत्ति-निरूपक साहित्येतिहास का अनुषंगी बनना पड़ता है। जब 'हंस' कथा मासिक की और से एक स्तम्भ शुरू करने का प्रस्ताव आया तो मैंने छूटते ही इस सदी की चुनिन्दा कहानियों पर लिखने की इच्छा जताई | मुझे लगा कि मैं जिन चीजों पर गौर करता रहा हूँ, उनका सही इस्तेमाल करने का समय आ गया है | यह इस्तेमाल सर्वोत्तम न सही, द्वितियोत्तम यानी सेकंड बेस्ट तो कहा ही जा सकता है ! आगे जो लेख आप पढने जा रहे हैं, वे 'खरामा-खरामा' स्तम्भ की ही कड़ियाँ हैं | इन्हें इनके प्रकाशन-क्रम में ही इस संग्रह में भी रखा गया है | कई कड़ियाँ ऐसी हैं जो अपनी स्वतंत्र श्रृंखला बनाती हैं | —भूमिका से

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    Sanjeev Kumar

    जन्म: 10 नवम्बर, 1967, पटना।

    शिक्षा : पटना विश्वविदयालय से बी.ए. और दिल्ली विश्वविदयालय से एम्.ए., एम.फिल, पी-एचडी. | फिलहाल दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर |

    किताबें : जैनेन्द्र और अज्ञेय: सृजन का सैद्धान्तिक नेपथ्य (2011 के देवीशंकर अवस्थी सम्मान से सम्मानित), तीन सौ रामायणे और अन्य निबंध (सम्पादित), बालाबोधिनी (वसुधा डालमिया के साथ सह-संपादन), योगेन्द्र दत्त के साथ मिलकर वसुधा डालमिया की पुस्तक नेशनलाइजेशन ऑफ हिन्दू ट्रेडिशन : भारतेंदु हरिश्चंद्र एंड नाइन्टीन्थ सेंचुरी बनारस का हिंदी में अनुवाद-हिन्दू परम्पराओं का राष्ट्रीयकरण : भारतेंदु हरिश्चंद्र और उन्नीसवीं सदी का बनारस, तेलंगाना संग्राम पर केन्द्रित पी. सुन्दरैया की किताब के संशिप्त संस्करण का हिंदी में अनुवाद-तेलंगाना का हथियारबंद जनसंघर्ष |

    आलोचना के अलावा गाहे-बगाहे व्यंग्य, कहानी, निबंध, संस्मरण जैसी विधाओं में लेखन | 2009 से जनवादी लेखक संघ की पत्रिका नया पथ के संपादन से जुड़ाव और 2018 से राजकमल प्रकाशन की पत्रिका आलोचना के संपादन की शुरुआत |

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