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Kasauti Par Media

Kasauti Par Media

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  • Pages: 224p
  • Year: 2014
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126726097
  •  
    Digital Edition Available Instantly on Pajkamal Books Library on
    पूँजी के भूमंडलीकरण और आर्थिक उदारवाद के आगमन के साथ शुरू हुए विस्मयकारी विस्तार ने मिडिया को यदि शक्तिशाली बनाया है तो उसका चरित्र भी बदल डाला है ! वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार पिछले आठ वर्षों से हंस के माध्यम से हम सबको बताते रहे हैं कि मीडिया में आए इस परिवर्तन की वजहें क्या हैं, कौन से दबाव और प्रभाव इसके पीछे काम कर रहे हैं और इनके उद्देश्य क्या हैं? ये एक बहुत ही जरूरी काम था जो हिंदी में बहुत देर से शुरू हुआ और बहुत कम हुआ ! हंस और मुकेश कुमार को इसका श्रेय जाता है कि उन्होंने इस जिम्मेदारी को पूरी गंभीरता के साथ निभाया ! मुकेश कुमार पिछले लगभग तीस साल से पत्रकरिता से जुड़े हुए हैं ! हंस में प्रकाशित उनके लेखों से जाहिर हो जाता है कि इस दौरान पत्रकारिता के सामने आने वाली चुनौतियों को वे देखते समझते रहे हैं ! साथ ही उन्होंने इन समस्याओं के भीतर झांककर उनके कारणों को भी जानने की कोशिश की है ! मीडिया के सामने कड़ी चुनोतियों का सामना करने के रास्तों पर भी उनकी नजर रही है ! उन्होंने मीडिया उद्योग के हर आयाम को करीब से देखा-समझा है, इसलिए वे मीडिया में आए परिवर्तनों को ज्यादा विश्वसनीय तरीके से लिख सके ! ऐसा करते हुए उन्होंने अतिरिक्त साहस का परिचय भी दिया, क्योंकि अपने ही पेशे की खामियों को बेबाकी से लिखना सबके लिए आसन नहीं ! मुझे लगता है की मुकेश कुमार ने इस पुरे दौर में पैदा हुई मीडिया की हर आहात, उसकी हर करवट और हर दिन बदलते उसके पितरों को अपनी नज़रों से ओझल नहीं होने दिया है ! फिर चाहे वह स्टिंग ऑपरेशन की सचाई हो, साम्राज्यवाद और बाजारवाद का दबदबा हो, फ़िल्मी चकाचोंध हो या क्रिकेट का कारवां हो, दंगा-फसाद हो या चमत्कारियों का संसार हो ! हर चीज को उन्होंने ईमानदारी से परखा है और अपनी साफ़ राय दी है ! मीडिया के बदलते रंग-ढंग की परीक्षा करते हुए उनका नजरिया बहुत ही स्पष्ट रहता है और वे ये काम पूरी जनपक्षधरता के साथ करते हैं ! टीआरपी की होड़ से पैदा हुई दुष्प्रवृत्तियों के खिलाफ सख्त रूख अपनाने से वे कभी पीछे नहीं हेट ! उनकी कलम ने मीडिया के उन्मादी स्वरुप की जमकर चीर-फाड़ की और उसके जातीय तथा सांप्रदायिक चरित्र को बेनकाब करने में अगुआ रहे ! इन लेखों में एक चिंता साफ़ दिखाई देती है कि खबर जो भी हो मीडिया अक्सर असल मुद्दे से हटकर, उसे भावुकता की चाशनी में डुबाकर उन्माद पैदा करने की कोशिश करता है ! मुकेश कुमार ने इस बात को प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया है कि रामजन्मभूमि विवाद के जमाने में भी हालत ऐसे ही थे और अब चाहे गुजरात के दंगे को लेकर विवाद हो या भारत पाक के बीच संकट की स्थिति, मीडिया में उन्माद के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता !

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    Mukesh Kumar

    मुकेश कुमार

    जन्म : 1 अक्टूबर, 1964, शहडोल, मध्यप्रदेश में।

    शिक्षा : प्राणिशास्त्र में एम.एस-सी. और जनसंचार एवं पत्रकारिता में स्नातक। टेलीविज़न न्यूज़ एवं बाज़ार के संबंधों में टीआरपी की भूमिका पर शोध।

    लगभग अट्ठाईस वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय। दैनिक समय, देशबंधु, माया, सेंटिनल, दैनिक नईदुनिया और समय सूत्रधार में काम करने के बाद बीस साल से टेलीविज़न पत्रकारिता।

    टेलीविज़न की दुनिया का जाना-पहचाना चेहरा। परख, फिलहाल, कही अनकही, सुबह सवेरे, साहित्य भारती और आपकी बैठक जैसे कार्यक्रमों में बतौर प्रस्तोता, निर्माता, निर्देशक कार्य किया। छह न्यूज़ चैनलों (सहारा-मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़, एस-1, वॉयस ऑफ इंडिया मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़, वॉयस ऑफ इंडिया-राजस्थान, मौर्य टीवी एवं न्यूज़ एक्सप्रेस) की सफलतापूर्वक शुरूआत की। भैरव प्रसाद गुप्त की कहानी पर आधारित टेलीफिल्म कंठा का सह निर्देशन एवं उसमें अभिनय भी किया। टीवी टुडे द्वारा निर्मित आज की नारी धारावाहिक के लिए पटकथा लेखन भी किया। इसके अलावा कई वृत्त चित्रों का निर्माण भी किया।

    पुस्तकें : टेलीविज़न पत्रकारिता पर लंबी शृंखला के तहत दो पुस्तकें टेलीविज़न की कहानी और ख़बरें विस्तार से प्रकाशित।

    अनुवाद की दो पुस्तकें प्रकाशित। फ्रांसीसी लेखक गाय सोर्मन की किताब जीनियस ऑफ इंडिया का हिंदी में भारत की आत्मा के नाम से और रक्षा विशेषज्ञ श्रीधर द्वारा लिखित किताब अफगानिस्तान बुज़कशी का लहूलुहान अफगानिस्तान के नाम से।

    कविता संकलन 'साधो! जग बौराना’ ।

    छिटपुट कहानियाँ एवं व्यंग्य लेखन।

    संपर्क : सी-1302 एपेक्स ग्रीन वैली, सेक्टर-9, वैशाली, $गाजि़याबाद, उत्तरप्रदेश।

    मोबाइल : 09811818858

    ई-मेल : mukeshkabir@gmail.com

    वीडियो : mukeshkumar.info

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