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Sanatan Dharmakosh Antim Satya

Sanatan Dharmakosh Antim Satya

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  • Pages: 332p
  • Year: 2013, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9789381863213
  •  
    पुस्तक के आत्म-निवेदन में डॉ. कृष्ण मोहन प्रसाद सिंह लिखते हैं कि ‘इस धार्मिक पुस्तक में भगवान् की तीन महाशक्तियाँ - श्रीराधा, श्रीसीता और श्रीशिवा, चारों वेद, अठारहों पुराण, 108 उपनिषदों, वाल्मीकि एवं स्वामी तुलसीदास कृत रामायण के सात कांडों, गीता के 18 अध्यायों, ओंकार-परमात्मा की ध्वनि, धर्म-परमात्मा की आत्मा, पंच देवता उपासना - पदार्थों एवं जीवों की उत्पत्ति का मूल कारण, महामंत्रों की शक्तियां एवं आधुनिक परिवेश में धर्मशास्त्रों पर आधारित कतिपय मूल प्रश्नों के उत्तर अत्यन्त ही सरल, सूक्ष्म एवं व्यावहारिक रूप से चित्रित किए गए हैं। ब्रह्म सनातन है, परब्रह्म सनातन है। परमात्मा ही धर्म है, और सिर्फ वही अन्तिम सत्य है। ‘वृहदाकार सम्पूर्ण धर्मशास्त्रों को समेटकर गूढ़ तत्त्वों को जिज्ञासु पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना बड़ा ही चुनौतीपूर्ण कार्य है। लेकिन यदि आप इसे थोड़ा-बहुत ही आत्मसात् कर सकें तो मेरे लिए बड़े ही सौभाग्य की बात होगी।’ वस्तुतः यह पुस्तक मनुष्य को एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जहाँ जिज्ञासा, आस्था, और विश्वास की विचित्र छवियाँ हैं। भौतिकता से आक्रान्त इस युग में यदि कोई अभौतिक सत्य का साक्षात्कार करना चाहता है तो यह पुस्तक उसे प्रकाश प्रदान कर सकती है। तर्क और तर्कातीत के मध्य विचरण करती यह रचना विराट चेतना की ओर पाठक का ध्यान आकृष्ट करती है।

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    Dr. Krishna Mohan Prasad singh

    जन्म: ग्राम: अमावाँ, जिला: नालन्दा (भूतपूर्व पटना), प्रान्त: बिहार, भारत में हुआ। 24 वर्ष से कनाडा का नागरिक एवं स्थायी निवासी।

    शिक्षा: भारत के शीर्षस्थ कृषि अनुसंधान संस्थान, दिल्ली से ‘प्रसार शिक्षा’ (मूलतः समाज विज्ञान की एक विशेष शाखा) में पी-एच.डी.।

    भारत, कनाडा, अमेरिका एवं अफ्रीका जैसे देशों के राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय सरकारी-गैर सरकारी संस्थानों (खासकर 6 वर्ष तक संयुक्त राष्ट्रसंघ के विभिन्न विभागों से जुड़े) में शिक्षण-प्रशिक्षण; प्रशासन एवं प्रबंधन आदि क्षेत्रों में 30 वर्षों का कार्य अनुभव।

    करीब 65 वर्ष की उम्र में एक अजीब सा खालीपन महसूस होने लगा। अपने स्वर्गीय पिताजी के निष्काम कर्मयोग एवं धर्म संस्कारों से प्रभावित होकर एवं विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन करनेे के बाद कुछ लिखने की आकांक्षा बलवती हुई।

    सम्प्रति: अध्यापन और लेखन को समर्पित।

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