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Camera: Meri teesari Ankh

Camera: Meri teesari Ankh

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  • Pages: 161p
  • Year: 2010
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126719624
  •  
    कैमरा मेरी तीसरी आँख: राधू करमाकर राधू करमाकर दरअसल राजकपूर के सबसे विश्वस्त सिनेमैटोग्राफर थे। ‘आवारा’ और ‘श्री 420’ जैसी उत्कृष्ट फिल्मों की उनकी खूबसूरत फोटोग्राफी को आज भी दर्शक उत्सुकता और रोमांच से देखते और सराहते हैं। राधू करमाकर की गणना उस दौर के विश्व के दस महान सिनेमैटोग्राफरों में की जाती थी। सोवियत रूस में इनकी कुछ फिल्मों को सिनेमैटोग्राफी के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था जिनका फ्रेम-दर-फ्रेम विश्लेषण करके सिनेमैटोग्राफी के विद्यार्थी फोटोग्राफी के गुर सीखते थे। यह पुस्तक उसी महान सिनेमैटोग्राफर की आत्मकथा है। इसमें मामूली कृषक परिवार से निकलकर भारतीय सिनेमा के सिनेमैटोग्राफी के क्षेत्र में उनके शिखर पर पहुँचने की रोचक यात्रा दर्ज है। राधू करमाकर के बयान में विलक्षण शालीनता है जो बालीवुड की दिखावे और बड़बोली दुनिया से अलग है। इनकी यह शालीनता केवल शब्द-व्यवहार नहीं है, यह उनके निजी व्यक्तित्व का अनिवार्य हिस्सा है। इस आत्मकथा में न तो कोई तेवर है और न ही कोई नाटकीय पैंतरे। इसमें वे जरूरी विश्वास हैं जो मानवीय स्थितियों और समाज को कई रूपों में पहचानने से बनते हैं। पुस्तक की वैचारिक संवेदना का दायरा बहुत बड़ा है। इसमें अपने वरिष्ठों और समवयसी फिल्मकर्मियों का सम्यक् और वस्तुपरक आकलन अंतरंगता के साथ किया गया है जिसकी मधुर छायाएं जगह-जगह दिखती हैं। विभिन्न विचार-पद्धतियों और जीवन-शैलियों को राधू करमाकर आत्मीय भाव से देखते हैं और अपनी असहमतियों को बेहिचक व्यक्त करते हैं। फिल्म की एक रील की तरह क्रमिक रूप से यह पुस्तक अपने समय और समाज की कई तहों को खोलती है जिसमें किस्सागोई और चित्रमयता का दुर्लभ मेल है। कहना न होगा कि यह पुस्तक भारतीय सिनेमा के बारे में हमारी जानकारी ही नहीं, उसके प्रति हमारे अनुराग को भी बढ़ाने का काम करती है। इस पुस्तक का अनुवाद सुपरिचित कवि-कथाकार विनोद दास ने किया है जिनकी फिल्म आलोचना की चर्चित पुस्तक भारतीय सिनेमा का अंतःकरण को सिनेमा साहित्य के अनुरागी संदर्भग्रंथ की तरह पढ़ते और सराहते हैं। अपना सा कोई नाम साम्प्रदायिक सद्भाव, अध्यात्म, प्रकृति, धर्म, दर्शन के विभिन्न रूपों-रंगों को बिखेरती ये कविताएँ एक इन्द्रथनुष बनाती हैं। सामान्य-सी दिखने वाली ये कविताएँ गहन, गूढ़ अर्थ रखती हैं और पाठक को संवेदना चिन्तन का दोहरा आस्वाद देती हैं। कवि विनोद कुमार चौधरी ने इन कविताओं को लोक भाषा का सौन्दर्य प्रदान कर उस गौरवशाली परम्परा और काव्य-शैली को प्रतिष्ठापित किया जिसमें हर शब्द के बहुआयामी अर्थ होते हैं और जो लोगों के साथ वस्तुओं और वनस्पतियों को भी गरिमा, गौरव और सम्मान प्रदान करती है। कवि नदी की ‘आत्मा’ के प्रति समर्पण भावना प्रदर्शित करते हुए प्रार्थना कर उसका अभिवादन करता है। उसकी श्रेष्ठता हमारे मानस में जगाता है और जन्म-भूमि की स्मृतियों को आभा-दीप्त करते हुए बताता है कि स्मृतियाँ हमारी धरोहर हैं, जो मन-आत्मा को सन्तोष प्रदान कर जीवन को प्रवाहमान बनाती हैं। अतीत और वर्तमान के बीच गहन रिश्ता बनाती ये कविताएँ हर वर्ग, हर आयु के पाठकों का ध्यान आकर्षित करने में सक्षम हैं।

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    Radhu Karmakar

    RadhuKarmakar

    • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
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    • Funda An Imprint of Radhakrishna
    • Korak An Imprint of Radhakrishna

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