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Marusthal Tatha Anya Kahaniyan

Marusthal Tatha Anya Kahaniyan

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  • Pages: 155p
  • Year: 1998
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: MTAK198
  •  
    ' 'सारे दुख एक तरह की अवधारणाएँ हैं । हम सब अपनी अवधारणाओं की वजह से दुख भोगते हैं ।'' यह एक वाक्य जयशंकर की कहानियों के बीच बिजली की कौंध की तरह चमक जाता है-एक तरह से उनकी लगभग सब कहानियों को चरितार्थ करता हुआ । धारणाएँ सच या झूठ नहीं होतीं-वे आत्म- वंचनाएं होती हैं, मनुष्य को अपने अनूठे सत्य से भटकाकर एक 'औसत' यथार्थ में अवमूल्‍यित करती हुईं । जयशंकर के पात्र जब इस सत्य से अवगत होते हैं, तब तक अपने 'सत्य' को जीने का समय गुजर चुका होता है । वह गुजर जाता है, लेकिन अपने पीछे अतृप्त लालसा की कोई किरच छोडू जाता है । जयशंकर के पात्र अकेले रहते हुए भी एक भरा- पूरा संपूर्ण जीवन की ललक लिए रहते हैं । छोटे जीवन की विराट अभिलाषाएँ, जो लहराने से पहले ही मुरझाने लगती हैं । शायद इसीलिए जयशंकर का विषण्ण रूपक 'मरुस्थल' है, जिसकी रेत इन कहानियों में हर जगह उड़ती दिखाई देती है-वे चाहे अस्पताल के गलियारे हों या सिमिट्री के मैदान या चर्च की वाटिकाएँ । लेखक ने अपनी अंतरंग दृष्टि और निस्संग सहृदयता से हिंदुस्तानी कस्बाती जीवन की घुटन, ताप, झुलसन की परतों को उघाड़ा है, जिनके नीचे विकलांग आदर्शों के भग्न अवशेष दबे हैं । संग्रह की एक कहानी में एक महिला ने अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ वर्ष विनोबा जी के साथ बिताए हैं, किंतु अस्पताल में रहते हुए अपने अंतिम दिनों में सहसा उसका सामना 'वासनाओं' से होता है, जिन्हें वह अपने भीतर दबाती आईं थी । प्रेम, सेक्स, परिवार-क्या इनके अभाव की क्षतिपूर्ति कोई भी आदर्श कर सकता है? आदर्श और आकांक्षाओं के बीच की अँधेरी खाई को क्या क्लासिकल संगीत, रूसी उपन्यास, उत्कृष्ट फिल्मों-पाट सकती हैं? क्या दूसरों के स्वप्न हमारे अपने जीवन की रिक्तता को रत्ती-भर भर सकते हैं? जयशंकर की हर कहानी में ये प्रश्न तीर की तरह बिंधे हैं । ''जीवन ने मुझे सवाल ही सवाल दिए उत्तर एक भी नहीं ।'' जयशंकर का एक पात्र अपने उत्पीड़ित क्षण में कहता है । हमारी दुनिया में उत्तरों की कमी नहीं हैं, लेकिन ''सही जीवन क्या है ?'' यह प्रश्न हमेशा अनुत्तरित रह जाता है...जयशंकर की ये कहानियाँ जीवन के इस 'अनुत्तरित प्रदेश' के सूने विस्तार में प्रतिध्वनित होते इस प्रश्न को शब्द देने का प्रयास करती हैं । -निर्मल वर्मा

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    Jaishankar Prasad

    जन्म : 30 जनवरी 1890, वाराणसी (उ.प्र.)।

    स्कूली शिक्षा मात्र आठवीं कक्षा तक। तत्पश्चात् घर पर ही संस्कृत, अंग्रेजी, पालि और प्राकृत भाषाओं का अध्ययन। इसके बाद भारतीय इतिहास, संस्कृति, दर्शन, साहित्य और पुराण-कथाओं का एकनिष्ठ स्वाध्याय। पिता देवीप्रसाद तम्बाकू और सुँघनी का व्यवसाय करते थे और वाराणसी में इनका परिवार 'सुँघनी साहू’ के नाम से प्रसिद्ध था। पिता के साथ बचपन में ही अनेक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों की यात्राएँ कीं।

    छायावादी कविता के चार प्रमुख उन्नायकों में से एक। एक महान लेखक के रूप में प्रख्यात। विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करुणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन। 48 वर्षों के छोटे-से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबन्ध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएँ।

    प्रमुख रचनाएँ : झरना, आँसू, लहर, कामायनी (काव्य); स्कन्दगुप्त, अजातशत्रु, चन्द्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, जनमेजय का नागयज्ञ, राज्यश्री (नाटक); छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी, इन्द्रजाल (कहानी-संग्रह); कंकाल, तितली, इरावती (उपन्यास)।

    14 जनवरी, 1937 को वाराणसी में निधन।

    • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Funda An Imprint of Radhakrishna
    • Korak An Imprint of Radhakrishna

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