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Ye Shahar Lagai Mohe Ban

Ye Shahar Lagai Mohe Ban

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  • Pages: 160p
  • Year: 2014
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126726363
  •  
    इस किताब के आखिरी सफहे पर यह इबारत दर्ज है- ‘कहते हैं, रूहों की आँखें हमेशा सलामत होती हैं ! उनकी याददाश्त कभी फिना नहीं होती ! वो सिर्फ गैब से आनेवाली किसी मोतबर आवाज की मुन्तजिर होती हैं !’ अपनी पिछली तमाम तहरीरों से बिलकुल अलग, इस किताब में, जाबिर हुसेन ने अपने पात्रों के नाम नहीं लिए ! उस बस्ती का नाम लेने से भी परहेज किया, जिसकी बे-चिराग गलियों में इस लम्बी कथा-डायरी की बुनियाद पड़ी ! एक बिलकुल नए फ्रेम में लिखी गई यह कथा-डायरी कुछ लोगों को जिन्दा रूहों की दास्ताँ की तरह लगेगी ! लेकिन इस दास्ताँ की जड़ें किसी पथरीली जमीं की गहराइयों में छिपी हैं ! जाबिर हुसेन ने इस पथरीली जमीन की गहराइयों में उतरने का खतरा मोल लिया है ! जिन जिन्दा रूहों को उन्होंने इस तहरीर में अपना हमसफ़र बनाया है, वो अगर उनसे खू-बहा तलब करें, तो उनके पास टूटे ख्वाबों के सिवा देने को क्या है ! जाबिर हुसेन जानते हैं, ये टूटे ख्वाब उनके लिए चाहे जितने कीमती हों, बस्ती की जिन्दा रूहों के सामने उनकी कोई वक्अत नहीं !

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    Zabir Hussain

    जाबिर हुसेन
    अंग्रेज़ी भाषा एवं साहित्य के प्राध्यापक रहे। जेपी तहरीक में बेहद सक्रिय भूमिका निभाई। आपातकाल के दौरान, भूमिगत साहित्य का सम्पादन-प्रकाशन। 1977 में मुंगेर से बिहार विधान सभा के लिए चुने गए। काबीना मंत्री बने। 1990-95 में बिहार अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष रहे।
    1995-2006 तक बिहार विधान परिषद् के सभापति। 2006-2012 संसद (राज्यसभा) के सदस्य।
    हिन्दी-उर्दू में दो दर्जन से ज़्यादा किताबें प्रकाशित। उर्दू-फारसी की लगभग 50 पांडुलिपियों का सम्पादन। विधान परिषद् की पत्रिका साक्ष्य, दस्तावेज़, उर्दू मरकज़ अज़ीमाबाद के मुख-पत्र तर्जुमान और उर्दूनामा का सम्पादन। सात वर्षों से हिन्दी पत्रिका दोआबा का सम्पादन।
    सम्मान : 2005 में उर्दू कथा-डायरी रेत पर $खेमा के लिए साहित्य अकादेमी सम्मान। 2012 में नवें विश्व हिन्दी सम्मेलन (जोहान्सबर्ग, दक्षिण अ$फ्रीका) में विश्व हिन्दी सम्मान।
    रचनाएँ : डोला बीबी का मज़ार, रेत पर खेमा, जि़न्दा होने का सबूत, लोगां, जो आगे हैं, अतीत का चेहरा, एक नदी रेत भरी, रेत-रेत लहू, आलोम लाजावा, ध्वनिमत काफी नहीं, दो चेहरों वाली एक नदी, सुन ऐ कातिब, बे-अमां, बिहार की पसमांदा मुस्लिम आबादियाँ।
    सम्पादन : छह जिल्दों में बहार हुसेनाबादी का सम्पूर्ण साहित्य। दीवारे शब, दयारे शब, हिसारे शब, निगारे शब (उर्दूनामा के अंक)।
    सम्पर्क : 247 एमआईजी, लोहियानगर, पटना- 800020

    • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Funda An Imprint of Radhakrishna
    • Korak An Imprint of Radhakrishna

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