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Muktibodh Sahitya Mein Nayi Pravrittiyan

Muktibodh Sahitya Mein Nayi Pravrittiyan

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Special Price Rs. 315

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  • Pages: 144p
  • Year: 2013
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126725342
  •  
    अपनी कविताओं में विचारों के आवेग को मुक्तिबोध अपने आत्मचित्रों से संतुलित और संवर्धित करते हुए उसमें हर बार एक नया रंग भरते चलते हैं । इस रूप में मुक्तिबोध आधुनिक यूरोपीय चित्रकारों की चित्रशैली और चित्रछवियों के अत्यंत निकट हैं । कविताएँ केवल शब्दों और लयों और विचारों से ही नहीं सजती, कविता में बीच-बीच में प्रकट होने वाले वे आत्मचित्र हैं जो उनके अन्तर्कथ्य को तराशते हैं । उनका यह आत्म उतना ही क्षत विक्षत, उतना ही रोमानी, उतना ही यातनादायी है जितना खड़ी बोली के दूसरे कवियों का । मुक्तिबोध कम्युनिस्ट होते हुए भी ललकार के कवि नहीं हैं, ललकार के भीतर की मजबूरी के कवि हैं । यही वह भविष्य दृष्टि है जो उन्हें हिन्दी के दूसरे कवियों से अलग करती है । वे बाहर देखते जरूर हैं लेकिन आत्मोन्मुख होकर । उनकी नजर बाहरी दुनिया के तटस्थ काव्यात्मक कथन में नहीं है, बल्कि बाहरी दुनिया के भीतरी टकरावों में है । इसीलिए वे हिन्दी के एक अलग और अनोखे किस्म के कवि हैं जिनकी तुलना किसी से नहीं ।

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    Doodhnath Singh

    दूधनाथ सिंह

    जन्म : 17 अक्टूबर, 1936, उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक छोटे-से गाँव सोबंथा में !

    शिक्षा : एम्.ए. (हिंदी साहित्य), इलाहबाद विश्वविद्यालय !

    जीविका : कुछ दिनों (1960-62) तक कलकत्ता में अध्यापन ! फिर इलाहबाद विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग में ! अब सेवानिवृत !

    लेखन : सन 1960 के आसपास से !

    कृतियाँ : आखिरी कलाम, निष्कासन, नमो अन्धकार (उपन्यास); सपाट चहरे वाला आदमी, सुखांत, प्रेमकथा का अंत न कोई, माई का शोकगीत, धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे, तू फू (कहानी-संग्रह); कथा समग्र (सम्पूर्ण कहानियां); यम्गाथा (नाटक); अपनी शताब्दी के नाम, एक और भी आदमी है, युवा खुशबू (कविता-संग्रह); सुरंग से लौटते हुए (लम्बी कविता); निराला : आत्महंता आस्था (निराला की कविताओं पर एक सम्पूर्ण किताब); लौट आ, ओ धर! (संस्मरणात्मक मुक्त गद्य); कहा-सुनी (साक्षात्कार और आलोचना); महादेवी (महादेवी की सम्पूर्ण रचनाओं पर एक किताब) !

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