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Vijeta

Vijeta

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  • Pages: 322p
  • Year: 2003
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: VIJETA356
  •  
    विजेता ‘विजेता’ और इसकी अगली कड़ी ‘तूफान झुका सकता नहीं’ नामक उपन्यासों में उज्बेकिस्तान के एक ग्राम-सोवियत की जनता को एकजुट सामूहिक श्रम और सामूहिक मेधा एवं कौशल से, खाली पड़ी धरती को ख्ेाती योग्य बनाते हुए, क्रान्तिविरोधी बसमाचियों द्वारा बन्द कर दिए गए कोकबुलाक चश्मे के उद्गम को खोजकर उसे फिर से चालू करते हुए और सामूहिक फार्मों के उत्पादन को तरह-तरह से आगे बढ़ाते हुए विस्तार से चित्रित किया गया है। आर्थिक सम्बन्धों के रूपांतरण के साथ ही जो नई सामाजिक-सांस्कृतिक-नैतिक-सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्य-मान्यताएँ, सम्बन्ध और संस्थाएं अस्तित्व में आ रही थीं तथा नऐ-पुराने के बीच जो संघर्ष अविराम जारी था, उसका लेखक ने विश्वसनीय और जीवंत चित्र उपस्थित किया है। कथा के फलक पर पार्टी और प्रशासकीय मशीनरी कीवह नौकरशाही भी मौजूद है। क्रांति-प्रर्वू समाज के अवशेष कुछ षड्यंत्रकारी विध्वंसक तत्व भी मौजूद हैं जो पुरानी पीढ़ी के कुछ लोगों की रूढ़िवादिता और नौकरशाही की हठधर्मिता का लाभ उठाकर सार्वजनिक संपत्ति और समाजवाद को नुकसान पहंुचाने की कोशिश करते हैं। पुराने मूल्यों और रूढ़ियों से चिपके कुछ पुराने लोग भी हैं जो धीरे-धीरे बदलते हैं। लेकिन नए और पुराने के बीच का संघर्ष लगातार चलता रहता है। इन सभी प्रवृत्तियों की पारस्परिक अंतर्क्रिया और संघात के रूप में आगे बढ़ते घटना-क्रम के बीच से नई दुनिया के उन नए नायकों के उदात्त, मानवीय चरित्र उभरते हैं जो पंूजी की संस्कृति के बरअक्स श्रम की संस्कृति की नुमाइंदगी करते हैं।

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    Sharaf Rashidov

    शराफ रसीदोबिच (1917-1983) ने जब ‘विजेता’ उपन्यास लिखा, तब चतुर्दिक समाजवाद के उत्कर्ष का माहौल था। चन्द वर्षों में ही द्वितीय विश्वयुद्ध की अकूत क्षति को पूरा करते हुए विराट समाजवादी उपक्रम चारों ओर खड़े किये जा रहे थे। जब वे ‘तूफान झुका सकते नहीं’ लिख रहे थे, उस समय तक पार्टी, राज्य और समाज में शक्ति-सन्तुलन संशोधनवादी शक्तियों के पक्ष में झुक चुका था और विपर्यय की दिशा तय हो चुकी थी। लेकिन सत्ता-संघर्ष अभी दो स्तरों पर जारी था। एक स्तर पर उन ताकतों का दमन हो रहा था जो अतीत की गलतियों को तो ठीक करना चाहती थीं लेकिन समाजवाद की बुनियादी नीतियों पर अडिग थीं।

    इन दोनों उपन्यासों में उज्बेकिस्तान के एक ग्राम-सोवियत की जनता को एकजुट सामूहिक श्रम और सामूहिक मेधा एवं कौशल से, खाली पड़ी धरती को खेती योग्य बनाते हुए, क्रान्तिविरोधी बसमाचियों द्वारा बन्द कर दिये गये कोकबुलाक चश्मे के उद्गम को खोजकर उसे फिर से चालू करते हुए और सामूहिक फार्मों के उत्पादन को तरह-तरह से आगे बढ़ाते हुए विस्तार से चित्रित किया गया है। आर्थिक सम्बन्धों के रूपान्तरण के साथ ही जो नई सामाजिक-सांस्कृतिक-नैतिक-सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्य-मान्यताएँ, सम्बन्ध और संस्थाएँ अस्तित्व में आ रही थीं तथा नये-पुराने के बीच जो संघर्ष अविराम जारी था, उसका लेखक ने विश्वसनीय और जीवन्त चित्र उपस्थित किया है।

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