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Saare Sukhan Humare

Saare Sukhan Humare

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  • Pages: 398P
  • Year: 2017, 11th Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126717606
  •  
    Digital Edition Available Instantly on Pajkamal Books Library on
    फै़ज़ अहमद फ़ैज़ उर्दू शायरी के एक ऐसे अजीमुश्शान शायर हैं जिन्होंने अपनी शायरी को अपने लहू की आग में तपाकर अवाम के दिलो-दिमाग़ तक ले गए और कुछ ऐसे अन्दाज़ में कि वह दुनिया के तमाम मजलूमों की आवाज़ बन गई। उनकी शायरी की ख़ास पहचान है - रोमानी तेवर में खालिस इंक़लाबी बात! यही कारण है कि ग़ालिब और इक़बाल के बाद जितनी शोहरत फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को मिली उतनी शायद किसी अन्य शायर को नहीं। फ़ैज़ मूलतः पाकिस्तान के थे किन्तु प्रगतिशील जीवन-दृष्टि के कारण उन्होंने देश की सीमा ही नहीं, भाषा, जाति और धर्म की भी मानवता के आगे कभी परवाह नहीं की। वे भारत में वैसे ही पसन्द किए जाते थे जैसे कि पाकिस्तान में उनकी शायरी मानवीयता, सामाजिकता और राजनीतिक सच्चाइयों का पर्याय है। ‘सारे सुख़न हमारे’ उनकी बेहतरीन शायरी का उर्दू से हिन्दी में किया गया अनुवाद है। इसमें फ़ैज़ की तमाम ग़ज़लों, नज़्मों, गीतों और क़तआत को पहली बार हिन्दी में संकलित किया गया है। इसमें उनका आख़िरी कलाम भी शामिल किया गया है। फ़ैज़ की शायरी की पहचान बस इतनी सी है कि फूलों के रंगो-बू से सराबोर शायरी से अगर आँच भी आ रही हो तो समझिए कि वो फ़ैज़ की शायरी है, फ़ैज़ की ही शायरी है।

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    Faiz Ahmed Faiz

    फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

    जन्म: सन् 1911; सियालकोट (अविभाजित पंजाब) में। प्रारम्भिक शिक्षा उर्दू-फ़ारसी-अरबी में। अंग्रेज़ी और अरबी साहित्य में एम.ए.।

    अमृतसर में अंग्रेज़ी प्राध्यापक के रूप में कार्यारम्भ। कई महत्‍वपूर्ण पत्रों का सम्पादन। 1928 में पहली ग़ज़ल और 1929 में पहली नज़्म कही। पाक सरकार द्वारा 1951 और 1958 में गिरफ़्तार।

    सानफ्ऱान्सिस्को, जिनेवा, चीन, लन्दन, मास्को, हंगरी, क्यूबा, लेबनान, अल्जीरिया, मिस्र, फिलिपाइन और इंडोनेशिया की यात्राएँ। 1964 में अब्दुल्ला हारून कॉलेज, कराची के प्रिंसिपल। 1968 में इदारा-ए-यादगार-ए-ग़ालिब की स्थापना और 1969 में ग़ालिब-शती समारोह का आयोजन।

    1972 में राष्ट्रीय कला परिषद्, पाकिस्तान के अध्यक्ष। 1973 में अफ्रो-एशियाई लेखक सम्मेलन के अल्मा-अता (सोवियत संघ) और 1978 में लुआंडा (अंगोला) अधिवेशन में हिस्सेदारी। 1962 में ‘लेनिन शान्ति पुरस्कार’ से सम्मानित। अफ्रो-एशियाई लेखक संघ की पत्रिका ‘लोटस’ के सम्पादक।

    प्रमुख पुस्तकें: नक़्शे-फ़रियादी, दस्ते-सबा, ज़िन्दाँनामा, दस्ते-तहे-संग, सरे-वादिए-सीना, शामे-शह्रे-याराँ, मेरे दिल मेरे मुसाफ़िर (कविता-संग्रह); मीजान (लेख-संग्रह); सलीबें मेरे दरीचे में (पत्नी के नाम पत्र); मताए-लौहो-क़लम (भाषण, लेख, साक्षात्कार, भूमिकाएँ, पत्र, नाटक आदि)।

    निधन: 20 नवम्बर, 1984 को लाहौर में।

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