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Krishnavtar : Vol.-6 : Mahamuni Vayas

Krishnavtar : Vol.-6 : Mahamuni Vayas

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Regular Price: Rs. 200

Special Price Rs. 180

10%

  • Pages: 230p
  • Year: 2010
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788171781119
  •  
    कृष्ण-चरित्र के अछूते-मार्मिक प्रसंगों को उद्घाटित करनेवाली वृहद औपन्यासिक कृति कृष्णावतार का यह छठा खंड है। लेखक के अनुसार, छठे खंड में निबद्ध होकर भी यह कथा इस समूची ग्रंथमाला की प्रस्तावना के समान है। अतः इस खंड की महत्ता स्वयंसिद्ध है। देश-काल की दृष्टि से यह वह समय है जब आर्यावर्त में वर्ण-व्यवस्था जन्म ले रही थी। ऐसे में मूल महाभारत के रचयिता, तीर्थ-संस्कृति के जनक और ‘श्रुति’ को प्रामाणिक रूप से लिपिबद्ध करनेवाले कृष्ण द्वैपायन व्यास अपने जीवन-काल में ही एक महान धर्म-निर्माता, महामुनि, यहाँ तक कि भगवान वेदव्यास के नाम से प्रसिद्ध हो गए थे। लेकिन एक मछुआरे की कन्या के गर्भ से पैदा होकर इस महान गौरव तक वे किस प्रकार पहँुचे, इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता। यह उपन्यास इसी अभाव की सुन्दरतम पूर्ति है। किशोर और युवा व्यास को इस कृति में हम अकल्पनीय रूप से सक्रिय देखते हैं, जिसे तत्कालीन समाज के जटिलतम संघर्षों और उसके अपने दुखों ने एक नया व्यक्तित्व प्रदान किया है। इसके अतिरिक्त इस उपन्यास में कितनी ही ऐसी घटनाएँ और चरित्र हैं, जो हमें मुग्ध और सम्मोहित कर लेते हैं।

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    K. M. Munshi

    गुजराती के सुप्रसिद्ध कथाकार, इतिहास और संस्कृति के मर्मज्ञ तथा प्राच्य विद्या के बहुश्रुत विद्वान।

    जन्म: 30 दिसम्बर, 1887, भड़ौच (गुजरात)।

    शिक्षा: बी.ए., एल-एल.बी., डी.लिट्., एल-एल.डी.।

    प्रारम्भ (1915) में ‘यंग इंडिया’ के संयुक्त संपादक, सन् 1938 से आजीवन, भारतीय विद्या भवन के अध्यक्ष और ‘भवन्स जर्नल’ के संपादक। सन् 1937-57 के दौरान दस वर्षों तक गुजराती साहित्य परिषद की अध्यक्षता की। सन् 1944 में हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष। सन् 1951 से मृत्युपर्यंत वह संस्कृत विश्व परिषद के भी अध्यक्ष रहे। सन् 1952 से 1957 तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल का पद-भार सँभाला। उसी दौरान सन् 1957 में उन्होंने भारतीय इतिहास कांग्रेस की अध्यक्षता की।

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