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Basharat Manzil

Basharat Manzil

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  • Pages: 250p
  • Year: 2004
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126708840
  •  
    बशारत मंज़िल ...एक उपन्यास जो लगभग दिल्ली ही के बारे में है - पुरानी यानी सन् 47 से पहले की दिल्ली। मेरी कहानी 15 अगस्त, 1947 तक घिसटती नहीं जाती, उससे पहले ही ख़त्म हो जाती है। हाँ, यक़ीनन जो कुछ भी उसमें होना होता है वह इस तारीख़ से पहले ही हो-हुवा चुकता है। एक व्यक्ति और उसके परिवार की कहानी जो एक ज़माने में हर जगह था। शायरी से लेकर सियासत यानी तुम्हारे शब्दों में हक़ीक़त से लेकर फसाने तक, हर जगह ! लेकिन आज जिसका उल्लेख न तो साहित्य में है, न इतिहास में। संजीदा सोजश् और बशारत मंज़िल की कहानी। बिल्लो और बिब्बो की कहानी। गश्जश्ल की कहानी। इन तीनों बहनों की माँ, अमीना बेगम की कहानी। सोजश् की दूसरी पत्नी, जो पहले तवाइफ़ थी और उसके बेटे की कहानी। सारी कहानियों की जो एक कहानी होती है, वह कहानी। मेरी और तुम्हारी कहानी भी उससे बहुत हटकर या अलग नहीं हो सकती। न है। चावड़ी बाजशर ? - मैंने कहना शुरू किया था - चलो, यहाँ से अन्दाजश्न उलटे हाथ को मुड़कर क़ाज़ी के हौजश् से होते हुए सिरकीवालों से गुजश्रकर लाल कुएँ तक पहुँचो। उसके आगे बड़ियों का कटरा हुआ करता था। वहाँ से आगे चलकर नए-बाँस आता था। वह सीधा रास्ता खारी बावली को निकल गया था। नुक्कड़ से जश्रा इधर ही दायें हाथ को एक गली मुड़ती थी। वह बताशोंवाली गली थी। एक जश्माने में वहाँ बताशे बनते आँखों से देखे जा सकते थे। बाद में वहाँ अचार-चटनी वालों का बड़ा मार्कीट बन गया था। मार्कीट के बीच से एक गली सीधे हाथ को मुड़ती थी। थोड़ी दूर जाकर बायीं तरफ़ एक पतली-सी गली उसमें से कट गई थी। इस गली में दूसरा मकान बशारत मंजिश्ल था: पुरानी तर्जश् की लेकिन नई-जैसी एक छोटी हवेलीनुमा इमारत। एक जश्माने में वह मकान अपने-आप में एक पता हुआ करता था मगर फिर वीरान होता गया। कुछ लोग उसे आसेबजश्दा समझने लगे, दूसरे मनहूस। आज तो यक़ीन के साथ यह भी नहीं कह सकते कि वह अपनी जगह मौजूद है या नहीं !

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    Manzoor Ehtesham

    जन्म: 3 अप्रैल, 1948 को भोपाल में।

    शिक्षा: स्नातक।

    इंजीनिय¯रग की अधूरी शिक्षा के बाद दवाएँ बेचीं। पिछले 25 वर्ष से फ़र्नीचर और इंटीरियर डेकोर का अपना व्यवसाय।

    प्रकाशित कृतियाँ: पहली कहानी रमज़ान में मौत 1973 में और पहला उपन्यास कुछ दिन और 1976 में प्रकाशित। उपन्यास: कुछ दिन और, सूखा बरगद, दास्तान-ए-लापता, पहर ढलते, बशारत मंज़िल; कहानी-संग्रह: तसबीह, तमाशा तथा अन्य कहानियाँ; नाटक: एक था बादशाह (सह-लेखक सत्येन कुमार)।

    सम्मान: सूखा बरगद (उपन्यास) पर श्रीकान्त वर्मा स्मृति सम्मान और भारतीय भाषा परिषद, कलकत्ता का पुरस्कार, दास्तान-ए-लापता (उपन्यास) पर वीरसिंह देव पुरस्कार, तसबीह (कथा-संग्रह) पर वागीश्वरी पुरस्कार तथा 1995 में समग्र लेखन पर पहल सम्मान, 2003 में राष्ट्रीय सम्मान ‘पद्मश्री’ से अलंकृत। निराला सृजनपीठ, भोपाल, के अध्यक्ष।

    सम्पर्क: शिल्पकार हाउस, ग्रांड होटल के सामने, भारत टॉकीज़ चौराहा, भोपाल-4620011

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