• (011) 23274463
  • Help
INR
 
Shopping Cart (0 item)
My Cart

You have no items in your shopping cart.

You're currently on:

Kagaji Hai Pairahan

Kagaji Hai Pairahan

Availability: In stock

-
+

Regular Price: Rs. 695

Special Price Rs. 626

10%

  • Pages: 266p
  • Year: 2019, 6th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8171789676
  • ISBN 13: 9788171789672
  •  
    उर्दू की विद्रोहिणी लेखिका इस्मत चुग़ताई हिंदी पाठकों के लिए भी उर्दू जितनी ही आत्मीय रही हैं । भारतीय समाज के रूढ़िवादी जीवन-मूल्यों और घिसी–पिटी परम्पराओं पर इस्मत चुग़ताई ने अपनी कहानियों से जितनी चोट की है और इसे एक अधिक मानवीय समाज बनाने में जितना बड़ा योगदान किया है, उसकी बराबरी कर पानेवाले लोग बिरले ही हैं । पाठकों के मन में सहज ही यह सवाल उठता रहा है कि इतनी पैनी नज़र से अपने परिवेश को टटोलनेवाली और इतने जीते–जागते पात्र रचनेवाली इस लेखिका की खुद अपनी बनावट क्या है, किस प्रक्रिया में उसका निर्माण हुआ है । इस्मत आपा ने शायद अपने पाठकों की इस जिज्ञासा को ध्यान में रखते हुए ही अपनी आत्मकथा काग़जी है पैरहन शीर्षक से कलमबंद की । कहने को ही यह पुस्तक आत्मकथा है । पढ़ने में यह बाकायदा उपन्यास और उपन्यास से भी ज़्यादा कुछ है । एक पूरे समय और समाज का इतना जीवन्त, इतना प्रामाणिक वर्णन मुश्किल से ही मिल सकता है । तीस के दशक में पर्देदार कुलीन मुस्लिम परिवार में एक लड़की के पढ़ने–लिखने में कितनी मुश्किलें आती होंगी, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है । ये मुश्किलें काग़जी है पैरहन की मुख्य कथावस्तु बनी हैं । लेकिन जो पीड़ा ये मुश्किलें एक जिद्दी लड़की के भीतर पैदा करती रही होंगी, उनका अंदाजा पाठक को खुद ही लगाना होगा क्योंकि अपने दुखों को बयान करना, आत्म–दया दिखाना इस्मत चुग़ताई की फि’तरत ही नहीं रहा । गद्य की लय क्या होती है, कितनी सहजता से यह लय जिंदगी की घनघोर उलझनों का बयान करा ले जाती है, इसका अप्रतिम उदाहरण यह पुस्तक है । खुद इस्मत आपा के शब्दों में : लिखते हुए मुझे ऐसा लगता है जैसे पढ़नेवाले मेरे सामने बैठे हैं, उनसे बातें कर रही हूँ और वो सुन रहे हैं । कुछ मेरे हमख़याल हैं, कुछ मोतरिज़ हैं, कुछ मुस्कुरा रहे हैं, कुछ गुस्सा हो रहे हैं । कुछ का वाक’ई जी जल रहा है ।

    Customer Reviews

    There are no customer reviews yet.

    Write Your Own Review

    Ismat Chugtai

    जन्म : 21 जुलाई, 1915, बदायूँ (उत्तर प्रदेश)।

    इस्मत ने निम्न मध्यवर्गीय मुस्लिम तबक़े की दबी-कुचली-सकुचाई और कुम्हलाई लेकिन जवान होती लड़कियों की मनोदशा को उर्दू कहानियों व उपन्यासों में पूरी सच्चाई से बयान किया है।

    इस्मत चुग़ताई पर उनकी मशहूर कहानी लिहाफ़ के लिए लाहौर हाईकोर्ट में मुक़दमा चला, लेकिन ख़ारिज हो गया। गेन्दा उनकी पहली कहानी थी जो 1949 में उर्दू साहित्य की सर्वोत्कृष्ट साहित्यिक पत्रिका 'साक़ी’ में छपी। उनका पहला उपन्यास जि़द्दी 1941 में प्रकाशित हुआ। मासूमा, सैदाई, जंगली कबूतर, दिल की दुनिया, अजीब आदमी और बांदी उनके अन्य उपन्यास हैं। कलियाँ, चोटें, एक रात, छुई-मुई, दो हाथ दोज़ख़ी, शैतान आदि कहानी-संग्रह हैं। हिन्दी में कुँवारी व अन्य कई कहानी-संग्रह तथा अंग्रेजी में उनकी कहानियों के तीन संग्रह प्रकाशित जिनमें काली काफ़ी मशहूर हुआ। कई फि़ल्में लिखीं और जुनून में एक रोल भी किया। 1943 में उनकी पहली फि़ल्म छेड़-छाड़ थी। कुल 13 फि़ल्मों से वे जुड़ी रहीं। उनकी आखि़री फि़ल्म गर्म हवा (1973) को कई अवार्ड मिले।

    साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा उन्हें 'इक़बाल सम्मान’, 'मख़दूम अवार्ड’ और 'नेहरू अवार्ड’ भी मिले। उर्दू दुनिया में 'इस्मत आपा’ के नाम से विख्यात इस लेखिका का निधन 24 अक्टूबर, 1991 को हुआ। उनकी वसीयत के अनुसार मुम्बई के चन्दनबाड़ी में उन्हें अग्नि को समर्पित किया गया।

    loading...
      • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Funda An Imprint of Radhakrishna
      • Korak An Imprint of Radhakrishna
    Location

    Address:1-B, Netaji Subhash Marg,
    Daryaganj, New Delhi-02

    Mail to: info@rajkamalprakashan.com

    Phone: +91 11 2327 4463/2328 8769

    Fax: +91 11 2327 8144