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  1. Apni Khabar

    Apni Khabar

    Regular Price: Rs. 125

    Special Price Rs. 94

    25%

    अपनी खबर -पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ अपनी खबर लेना और अपनी खबर देना-जीवनी साहित्य की दो बुनियादी विशेषताएँ हैं। और फिर उग्र जैसे लेखक की ‘अपनी खबर’। उनके जैसी बेबाकी, साफगोई और जीवन्त भाषा-शैली हिन्दी में आज भी दुर्लभ है। उग्र-पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’- हिन्दी के प्रारम्भिक इतिहास के एक स्तम्भ रहे हैं और यह कृति उनके जीवन के प्रारम्भिक इक्कीस वर्षों के विविधता- भरे क्रिया-व्यापारों का उद्घाटन करती है। हिन्दी के आत्मकथा-साहित्य में ‘अपनी खबर’ को मील का पत्थर माना जाता है। अपने निजी जीवनानुभवों, उद्वेगों और घटनाओं को इन पृष्ठों में उग्र ने जिस खुलेपन से चित्रित किया है, उनसे हमारे सामने मानव-स्वभाव की अनेकानेक सच्चाइयाँ उजागर हो उठती हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि मनुष्य का विकास उसकी निजी अच्छाइयों-बुराइयों के बावज़ूद अपने युग-परिवेश से भी प्रभावित होता है। यही कारण है कि आत्मकथा- साहित्य व्यक्तिगत होकर भी सार्वजनीन और सार्वकालिक महत्व रखता है।

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  2. Vyomkesh Darvesh

    Vyomkesh Darvesh

    Regular Price: Rs. 295

    Special Price Rs. 265

    10%

    व्योमकेश दरवेश आकाशधर्मा गुरु आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी अपने जीवन-काल में ही मिथक-पुरुष बन गए थे। हिन्दी में ‘आकाशधर्मा’ और ‘मिथक’ इन दोनों शब्दों के प्रयोग का प्रवर्तन उन्होंने ही किया था। उनका रचित साहित्य विविध एवं विपुल है। उनके शिष्य देश-विदेश में बिखरे हैं। लगभग साठ वर्षों तक उन्होंने सरस्वती की अनवरत साधना की। उन्होंने हिन्दी साहित्य के इतिहास का नया दिक्काल एवं प्राचीन भारत का आत्मीय-सांस्कृतिक पर्यावरण रचा। हिन्दी की जातीय संस्कृति के मूल्यों की खोज की, उन्हें अखिल भारतीय एवं मानवीय मूल्यों के सन्दर्भ में परिभाषित किया। परम्परा और आधुनिकता की पहचान कराई। सहज के सौन्दर्य को प्रतिष्ठित किया। वे उन दुर्लभ विद्वान् सर्जकों की परम्परा में हैं जिसके प्रतिमान तुलसीदास हैं और जिसमें पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी स्मरणीय हैं। उनका जीवन-संघर्ष विस्थापित होते रहने का संघर्ष है। उनकी जीवन-यात्रा के बारे में लिखना जितना जरूरी है उससे ज्यादा मुश्किल। इस पुस्तक के लेखक को दो दशकों से भी अधिक समय तक उनका सान्निध्य और शिष्यत्व प्राप्त होने का सौभाग्य मिला। इसलिए पुस्तक को संस्मरणात्मक भी हो जाना पड़ा है। प्रयास किया गया है कि प्रसंगों और स्थितियों को यथासम्भव प्रामाणिक स्रोतों से ही ग्रहण किया जाए। आदरणीयों के प्रति आदर में कमी न आने पावे। काशी की तत्कालीन साहित्य-मंडली, लेखक की मित्र-मंडली अनायास पुस्तक में आ गई है।

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  3. 365 Swasthya Mantra

    365 Swasthya Mantra

    Regular Price: Rs. 295

    Special Price Rs. 221

    25%

    365 स्वास्थ्य मंत्र सच्चा सुख जीवन को भरपूर रूप से जीने में ही है। लेकिन जिंदगी के सफर में कुछ क्षण सुख के होते हैं, तो कुछ कष्ट मंे भी गुजरते हैं। यह सच है कि कुछ कष्ट उन रोग- विकारों से जाग्रत होते हैं जिन पर हमारा वश नहीं चलता, किंतु बहुतेरे हमारी अपनी लापरवाही की उपज होते हैं। समाज में फैले तरह-तरह के अंधविश्वास, मिथक और मानव धर्म के उसूलों को ताक पर रख मात्रा धन अर्जित करने की लालसा में फैलाए गए मायाजाल और भ्रामक विज्ञापनों से भी हम गुमराह हो कई बार गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं। जरूरत सिर्फ सच्चाई जानने और फिर जीवन में उसे उतारने की है। हम क्या खाएं, क्या न खाएं कि शरीर और मन हृष्ट-पुष्ट रहे; अपने बच्चों की देखभाल और संभाल हम कैसे करें कि उनका नटखट बचपन फूलों की तरह खिला हुआ और मुस्कराहट से भरा रहे; युवा उम्र में किशोर-किशोरियों के मन में उठनेवाली उलझनें समझ हम उनका सच्चा समाधान दे सकें; स्त्री जीवन में आने वाली कठिनाइयों और आम समस्याओं से उबरने के सरल नुस्खे हम जान सकें; मातृत्व पर्व का समय सुख में बीते और वैवाहिक जीवन को प्यार के गीतों से सजाए रखने के संुदर रहस्य हम जान सकें तो जीवन सदा आनंद के चिर खिले रहने वाले फूलों की खुशबू से महकता रहेगा। प्रस्तुत कृति में जीवन से जुड़े इन तमाम व्यावहारिक पहलुओं पर दो-टूक साफ-सुथरी जानकारी देने के साथ-साथ पेशे से चिकित्सक डॉ. यतीश अग्रवाल और जीवविज्ञानी डॉ. रेखा अग्रवाल ने सलोनी काया रेशमी बाल, मन-मस्तिष्क की वीणा, अंखियों ही अंखियांे में, दांतों और मसूढ़ांे का टोला, द ईएनटी एंड रेस्पीरेटरी क्लीनिक, हार्ट टू हार्ट, डायबिटीज के पेंच, पाचन तंत्रा और पेट की नगरी, द किडनी एंड प्रोस्टेट जंकशन, टीबी का राजरोग, हड्डियांे और जोड़ों का चल संसार, फर्स्ट एड, दवाओं का बक्सा, जांच-परीक्षणों की दुनिया, फिटनेस क्लब तथा सुहाना सफर और छुट्टियों के दिन जैसे साल भर हर दिन काम आनेवाले विषयों पर प्रामाणिक अद्यतन ज्ञान सरल सूत्रों और आम बोलचाल की भाषा में प्रस्तुत किया है। 365 स्वास्थ्य मंत्र हर घर और हर पुस्तकालय में रखी जानेवाली उपयोगी कृति है जिससे पाठक साल के 365 दिन लाभान्वित हो सकता है।
  4. Agle Janam Mohe Bitia Na Kejo

    Agle Janam Mohe Bitia Na Kejo

    Regular Price: Rs. 60

    Special Price Rs. 45

    25%

    अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो – कुर्रतुल ऍन हैदर ‘अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो’ मामूली नाचने-गानेवाली दो बहनों की कहानी है, जो बार-बार मर्दों के छलावों का शिकार होती हैं ! फिर भी यह उपन्यास जागीरदार घरानों के आर्थिक ही नहीं, भावनात्मक खोखलेपन को भी जिस तरह उभारकर सामने लाता है, उसकी मिसाल उर्दू साहित्य में मिलना कठिन है ! एक जागीरदार घराने के आगा फरहाद बकोल कूद पच्चीस साल के बाद भी रश्के-कमर को भूल नहीं पते और हालात का सितम यह की उसके लिए बंदोबस्त करते हैं तो कुछेक गजलों का ताकि ‘अगर तुम वापस आओ और मुशायरो में मदऊ (आमंत्रित) किया जाय तो ये गजलें तुम्हारे काम आएँगी !’ आखिर सबकुछ लुटने के बाद रश्के-कमर के पास बचता है तो बस यही की ‘कुर्तो की तुरपाई फी कुरता दस पैसे....’ खोखलापन और दिखावा-जागीरदार तबके की इस त्रासदी को सामने लेन का काम ‘दिलरुबा’ उपन्यास भी करता है ! मगर विरोधाभास यह है कि समाज बदल रहा है और यह तबका भी इस बदलाव से अछूता नहीं रह सकता ! यहाँ लेखिका ने प्रतीक इस्तेमाल किया है फिल्म उद्योग का, जिसके बारे में इस तबके की नौजवान पीढ़ी भी उस विरोध-भावना से मुक्त है जो उनके बुजुर्गों में पाई जाती थी !
  5. Ek Break Ke Baad

    Ek Break Ke Baad

    Regular Price: Rs. 150

    Special Price Rs. 113

    25%

    एक ब्रेक के बाद उम्र के जिस मुक़ाम पर लोग रिटायर होकर चुक जाते हैं, के.वी. शंकर अय्यर के पास नौकरियाँ चक्कर लगा रही हैं। के.वी. मानते हैं कि इंडिया के इकोनॉमिक ‘बूम’ में देश की एक अरब जनता के पास खुशहाली के सपने हैं। दुनिया का शासन अब सरकारों के हाथ नहीं, कॉरपोरेट कम्पनियों के हाथों में है। मल्टीनेशनल कम्पनी का एक्जीक्यूटिव गुरुचरण राय के.वी. की बातों को बिना काटे सुनता रहता है। वह बीच-बीच में पहाड़ों पर क्या करने जाता है, इसकी कोई भनक के.वी. को नहीं है। अन्ततः वह कम्पनी के काम से मध्यप्रदेश के किसी सुदूर प्रान्त में जाकर लापता हो जाता है। एक ब्रेक के बाद, जिसमें वह एक आई-गई ख़बर हो गया है, के.वी. को मिलती हैं उसकी डायरियाँ, जिसमें लिखी बातों का कोई तुक उन्हें नज़र नहीं आता। उपन्यास के तीसरे पात्र भट्ट की नियति एक नौकरी से दूसरी नौकरी तक शहर-शहर भटकने की है। कॉरपोरेट दुनिया के थपेड़े खाते-खाते वह बीच में गुरुचरण उर्फ गुरु के साथ पहाड़-पहाड़ घूमता है। स्त्रियों के साथ सम्बन्धों में गुरु क्या खोजता है या उसका क्या सपना है, यह जाने बगैर गुरु के साथ भट्ट यायावरी करता जीवन के कई सत्यों से टकराता रहता है। अलका सरावगी का यह नया उपन्यास कॉरपोरेट इंडिया की तमाम मान्यताओं, विडम्बनाओं और धोखों से गुज़रता है। इस दुनिया के बाजू में कहीं वह पुराना ‘पोंगापंथी’ और पिछड़ा भारत है, जहाँ तीस करोड़ लोग सड़क के कुत्तों जैसी ज़िन्दगी जीते हैं। कॉरपोरेट इंडिया अपने लुभावने सपनों में खोया यह मान लेता है कि ‘ट्रिकल डाउन इफ़ेक्ट’ से नीचेवालों को देर-सबेर फ़ायदा होना ही है। गुरुचरण का कॉरपोरेट जगत का चोला छोड़कर सिर्फ गुरु बनकर जीने का निर्णय तथाकथित विकास की अन्धी दौड़ का मौन प्रतिरोध है। गुरु के रूप में भी उसकी मृत्यु एक तरह से औपन्यासिक आत्महत्या मानी जा सकती है। जिस तरह की संवेदनात्मक दुनिया बनाने का उसका सपना है, उसकी क़ब्र पर कॉरपोरेट इंडिया उग आया है, जिसमें भट्ट जैसे लोगों के नये सपने और नई सफलताएँ हैं।
  6. Seen : 75

    Seen : 75

    Regular Price: Rs. 50

    Special Price Rs. 38

    25%

    सीन: 75 ‘‘अली अमजद से मिलाया था न मैंने तुमको ?’’ ‘‘वह राइटर ?’’ ‘‘हाँ !’’ ‘‘हाँ-हाँ यार, याद आ गया। बड़ा मज़ेदार आदमी है।’’ ‘‘उसी का तो चक्कर है।’’ हरीश ने कहा, ‘‘आज ही प्रीमियर है। और वह मर गया। समझ में नहीं आता क्या करूँ ?’’ ‘‘मर कैसे गया ?’’ ‘‘पता नहीं। में अभी वहीं जा रहा हूँ।’’ आईने में उसने अपने चेहरे को उदास बनाकर देखा। उसे अपना उदास चेहरा अच्छा नहीं लगा। उसने आँखों को और उदास कर लिया... अली अजमद मरा नहीं, कत्ल किया गया है। और उसे कत्ल किया है इस जालिम समाज, बेमुरव्वत हालात और इस बेदर्द फिल्म इंडस्ट्री ने... उसने गरदन झटक दी। बयान का यह स्टाइल उसे अच्छा नहीं लगा। मेरा दोस्त अली अमजद एक आदमी की तरह जिया और किसी हिन्दी फिल्म की तरह बिला वज़ह खत्म हो गया।... दाढ़ी बनाते-बनाते उसने अपना बयान तैयार कर लिया। और इसलिए जब वह अली अमजद के फ्लैट में दाखिल हुआ तो वह बिल्कुल परेशान नहीं था। हिन्दी फिल्म उद्योग की चमचमाती दुनिया की कुछ स्याह और उदास छवियों को बेपर्दा करता उपन्यास।
  7. Main Borishailla

    Main Borishailla

    Regular Price: Rs. 295

    Special Price Rs. 221

    25%

    मैं बोरिशाइल्ला महुआ माजी महुआ माजी का पहला उपन्यास - ‘मैं बोरिशाइल्ला’ हिन्दी उपन्यासों की दुनिया में अपने पदार्पण के बाद से ही कथानक के अनूठेपन के कारण चर्चित रहा है। उपन्यास की पृष्ठभूमि में अविभाजित भारत के पूर्वी बंगाल, ख़ासकर बोरिशाल की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है। महुआ माजी के पूर्वज बोरिशाल से ही आकर भारत के विभिन्न हिस्सों में बसे थे इसलिए बोरिशाल से उनका भावनात्मक लगाव है। उपन्यास बोरिशाल के एक पात्र से शुरू हुआ है और बांग्लादेश का निर्माण उसका उत्कर्ष है। ‘मैं बोरिशाइल्ला’ में राष्ट्र-राज्य बनाम साम्प्रदायिक राष्ट्र की बहस दिलचस्प ढंग से चलती है और बांग्लादेश की ‘मुक्ति-कथा’ का स्वरूप भाषायी राष्ट्रवाद में तब्दील होकर पाठकों को चमत्कृत कर देता है। मुक्ति-संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सैनिकों तथा उर्दू भाषी नागरिकों द्वारा बांग्लाभाषियों पर किए गए अत्याचारों तथा उसके ज़बरदस्त प्रतिरोध का बहुत प्रामाणिक चित्रण हुआ है। इस उपन्यास का अर्थ ज़मीन से जुड़ी कथा-भाषा और स्थानीय प्रकृति में किस तरह ढक जाता है इसका अन्दाज़ ही नहीं लगता। यह उपन्यास घटनाओं के जीवन्त चित्रण की विलक्षण शैली के कारण बेहद रोचक और पठनीय है। समय तथा समाज की तमाम विसंगतियों को अपने में समेटे एक बहुआयामी उपन्यास है - ‘मैं बोरिशाइल्ला। इसमें प्रेम की अन्तःसलिला भी बहती है और एक राष्ट्र के टूटने और बनने की कथा भी!
  8. Aahat Desh

    Aahat Desh

    Regular Price: Rs. 175

    Special Price Rs. 131

    25%

    आहत देश इस पुस्तक में माओवादियों और उसी क्षेत्रांतर्गत रहने वाले आदिवासियों पर केन्द्रित सारगर्भित और प्रतिबद्ध दृष्टिकोण से लिखे लेख हैं। ऐसे कम ही बाहरी लोग हैं माओवादी आन्दोलन की असली प्रकृति के बारे में जानकारी है। ये लेख उसकी वस्तुस्थिति से जानकारी भी नहीं कराते हैं और पुलिस-प्रशासन की निरंकुश कार्रवाई पर प्रश्नचिद्द लगाकर न्यायसंगत सन्दभ में सोचने पर भी विवश करते हैं।
  9. Bhoomkal : Kamredo Ke Sath

    Bhoomkal : Kamredo Ke Sath

    Regular Price: Rs. 95

    Special Price Rs. 85

    11%

    पुस्तक में लेखिका ने माओवादियों के क्षेत्र में विचरण कर आँखों देखा ब्यौरा प्रस्तुत किया है और दन्तेवाड़ा में आदिवासियों के जीवन तथा माओवादियों से की गई मुलाकातों और उनकी सोच तथा जीवन स्थितियों को संवेदनशील ढंग से अभिव्यक्त किया है। कॉमरेड कमला, कॉमरेड वेणु सहित अन्य कॉमरेडों के साथ किया यह सफर उन स्थितियों और परिस्थितियों से भी अवगत कराता है जो उन्हें माओवादी बनाती हैं।

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  10. Kathghare Mein Loktantra

    Kathghare Mein Loktantra

    Regular Price: Rs. 150

    Special Price Rs. 135

    10%

    कठघरे में लोकतंत्र अपने जनवादी सरोकारों और ठोस तथ्यपरक तार्किक गद्य के बल पर अरुन्धति रॉय ने आज एक प्रखर चिन्तक और सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अपना ख्शास मुक़ाम हासिल कर लिया है। उनके सरोकारों का अन्दाज़ा उनके चर्चित उपन्यास, ‘मामूली चीज़ों का देवता’ ही से होने लगा था, लेकिन इसे उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता की निशानी ही माना जायेगा कि अपने विचारों और सरोकारों को और व्यापक रूप से अभिव्यक्त करने के लिए, अरुन्धति रॉय ने अपने पाठकों की उम्मीदों को झुठलाते हुए, कथा की विधा का नहीं, बल्कि वैचारिक गद्य का माध्यम चुना और चूँकि वे स्वानुभूत सत्य पर विश्वास करती हैं, उन्होंने न सिर्फ़ नर्मदा आन्दोलन के बारे में अत्यन्त विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित किया, बल्कि उस आन्दोलन में सक्रिय तौर पर शिरकत भी की। यही सिलसिला आगे परमाणु प्रसंग, अमरीका की एकाधिपत्यवादी नीतियों और ऐसे ही दूसरे ज्वलन्त विषयों पर लिखे गये लेखों की शक्ल में सामने आया। ‘कठघरे में लोकतन्त्र’ इसी सिलसिले की अगली कड़ी है इस पुस्तक में संकलित लेखों में अरुन्धति रॉय ने आम जनता पर राज्य-तन्त्र के दमन और उत्पीड़न का जायज़ा लिया है, चाहे वह हिन्दुस्तान में हो या तुर्की में या फिर अमरीका में। जैसा कि इस किताब के शीर्षक से साफ़ है, ये सारे लेख ऐसी तमाम कार्रवाइयों पर सवाल उठाते हैं जिनके चलते लोकतन्त्र - यानी जनता द्वारा जनता के लिए जनता का शासन - मुट्ठी भर सत्ताधारियों का बँधुआ बन जाता है। अपनी बेबाक मगर तार्किक शैली में अरुन्धति रॉय ने तीखे और ज़रूरी सवाल उठाये हैं, जो नये विचारों ही को नहीं, नयी सक्रियता को भी प्रेरित करेंगे। और यह सच्चे लोकतन्त्र के प्रति अरुन्धति की अडिग निष्ठा का सबूत हैं। - नीलाभ

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