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Mahagatha Vrikshon Ki

Mahagatha Vrikshon Ki

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  • Pages: 102p
  • Year: 1997
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 817119317x
  •  
    मानव जीवन को प्राणवायु देनेवाले वृक्षों के बारे में हमारी पीढी की जानकारी निरन्तर सीमित होती जा रही है । हमारे आसपास के प्राकृतिक परिवेश में. ऋतु-चक्र के अनुसार न जाने कितने ही प्रकार के वृक्ष फलते-फूलते हैं लेकिन आधुनिक जीवन की आपाधापी में फंसी हमारी जीवन-चर्या उनके जादुई संस्पर्श से वंचित रह जाती है । कैसी विडंबना है कि मानव जीवन को सौंदर्यानुभूति से भर देनेवाली हमारी वृक्ष-संपदा दिन-अनुदिन उपेक्षित होती जा रही है । हमारी तथाकथित विकास योजनाओं का पहला प्रहार वृक्षों और वन-सम्पदा को ही झेलना पड़ता है । कैसा दुर्भाग्य है कि अमलतास की टहनियों ने कब चटक पीले झुमके पहन लिए? शाल्मली और टेसू की शाखों पर ये सुर्ख अंगार जैसी लाली कहाँ से आ गई? मौलश्री और पारिजात के वृक्ष कब से अपनी मादक गंध हवा में घोल रहे हैं और हरसिंगार ने वसुधा पर कैसी सुंदर फूलों की गंधमान चादर बिछा दी है, हम जान ही नहीं पाते । अरुकेरिया, मनीप्लांट और बसाई को ड्राईंगरूम की शोभा माननेवाली आधुनिक संस्कृति के एकांगी दृष्टिकोण के कारण भारतीय मूल के अगणित वृक्ष निरंतर उपेक्षित हो रहे हैं । वे वृक्ष जिनके इर्द-गिर्द हमारा बचपन बीता है, जिनके चारों ओर धागे बाँधती हमारी दादी-नानी परिक्रमा लगाती थीं. जिनकी मृदु छाया में श्रीकृष्ण वंशी बजाते थे, सीता ने अपना निर्वासित जीवन जिया. और गौतम बुद्ध को बोधिसत्व प्राप्त हुआ. ऐसे वृक्षों के बारे में प्रामाणिक जानकारी इस पुस्तक में संजोई गई है । सरल एवं लालित्यपूर्ण भाषा में लिखी इस पुस्तक की आकर्षित करनेवाली एक विशिष्टता यह भी है कि विदुषी लेखिका ने सांस्कृतिक, साहित्यिक, आयुर्वेदिक एवं लोकमानस में समाई किंवदन्तियों- के सहारे भारतीय मूल के सोलह विशिष्ट वृक्षों के बारे में जो विस्तत जानकारी इस पुस्तक में जुटाई है वह संभवत: हिंदी में अपनी तरह का एक नूतन प्रयास है । पर्यावरण की चिंता करनेवाले जागरूक मानस और भारत-भूमि की अमित उर्वरा शक्ति और सुवास से आहलादित होनेवाले पाठकों के लिए यह पुस्तक एक प्रीतिकर अनुभव सिद्ध होगी ।

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    Pratibha Arya

    जन्म: 1938 में अविभाजित भारत के लाहौर शहर में, परन्तु बचपन रुड़की, जिला हरिद्वार, उत्तरांचल में बीता। आरम्भिक शिक्षा रुड़की और उच्च शिक्षा लखनऊ में सम्पन्न हुई। मातृभाषा पंजाबी है, परन्तु हिन्दी, अंग्रेजी के अतिरिक्त उर्दू, संस्कृत व बंगला भाषा का भी पर्याप्त ज्ञान है।

    1968 से 1983 तक दिल्ली की सर्वोत्तम व्यक्तिगत गृह वाटिका का पुरस्कार लगातार प्राप्त किया। दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित पुष्प प्रदर्शनियों में अनेक ट्राफियों के साथ सर्वोच्च चैलेंज कप कई वर्षों तक लगातार जीत कर इस क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित किया। पिछले दो दशक से भी अधिक समय से, वामा, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, संडे आब्जर्वर, कादम्बिनी, गृहशोभा, फलफूल, खेती जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में पर्यावरण, बागवानी एवं वृक्ष व पौधों पर लेखन। अब तक ढाई सौ से अधिक लेख छप चुके हैं। भारतीय मूल के वृक्षों पर साहित्यिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक : ष्टि से सुन्दर अनुसन्धानात्मक लेख लिखे। मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी में पिछले दो वर्षों से अखिल भारतीय सेवाओं के प्रशिक्षणार्थियों के लिए बागवानी पर कार्य- शालाएँ प्रस्तुत कर रही हैं। गुलाब, गुलदाऊदी, डहलिया, कैक्टस व बोगनविलिया की राष्ट्रीय संस्थाओं की आजीवन सदस्या और विभिन्न प्रसिद्ध पुष्प प्रदर्शनियों के निर्णायक मंडल में शामिल हैं।

    प्रकाशन: पेड़ों की कहानी, पेड़ों की जुबानी (सचित्र बालोपयोगी), कुटकुट का कमाल, घोंसले की तलाश (बालोपयोगी कथा-पुस्तकें) एवं महागाथा वृक्षों की।

    संपर्क: द्वारा: डॉ. वेदज्ञ आर्य, ‘नवनीत’, 40 सिविल लाइन्स रुड़की, जिला हरिद्वार, उत्तरांचल।

    • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Funda An Imprint of Radhakrishna
    • Korak An Imprint of Radhakrishna
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