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Satya-Vrat Katha

Satya-Vrat Katha

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  • Pages: 180p
  • Year: 2015
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183615020
  •  
    सत्यव्रत कथा यह प्रबन्धन का युग है। हर क्षेत्र में हर बात में प्रबन्धन है। जीवन में सफलता अर्जित करने के जितने सूत्र हैं उनमें से एक प्रमुख है सत्य और सत्य का भी अपना प्रबन्धन होता है। वैसे तो श्रीसत्यनारायणव्रतकथा बहुत प्राचीन है लेकिन इसमें प्रबन्धन के जो सूत्र आए हैं वे बिलकुल नवीन हैं, आज के लिए उपयोगी हैं और हर क्षेत्र में सफलता को सुनिश्चित करते हैं। इस कथा में पाँच अध्याय हैं और प्रत्येक में प्रबन्धन के गूढ़ सूत्र हैं। पहले अध्याय में सेवा प्रबन्धन, दूसरे में सम्पत्ति प्रबन्धन, तीसरे में सन्तान प्रबन्धन, चौथे में संघर्ष प्रबन्धन और पाँचवें में संस्कार प्रबन्धन को देखा जा सकता है। हम देख रहे हैं कि वर्षों से अनेक परिवारों में, कई स्थानों पर श्रीसत्यनारायणव्रतकथा हो रही है। हमने ही इसको एक पारम्परिक, पारिवारिक और सामान्य-सा धार्मिक आयोजन बना दिया है। या तो हम स्वयं कथा करते हैं या किसी विद्वान् से करवाते हैं। पंडितजी आते हैं, संस्कृत या हिन्दी में कथा करते हैं। घर की महिलाएँ रसोईघर में प्रसाद बनाने में व्यस्त रहती हैं। बच्चे इस दिन जितना हो सके उपद्रव कर लेते हैं। यजमान या तो फोन सुनेंगे या कौन आया, कौन नहीं आया यह सब देखने में ही उनका समय बीत जाता है। कथा आरम्भ होती है, कथा समाप्त हो जाती है। हमने इसको एकत्र साधारण-सा आयोजन बना दिया है। यह कथा ऐसी सामान्य कथा नहीं है। इस कथा के पीछे भाव यह है कि जीवन में ‘सत्य’ उतरे। इस कथा में दो प्रमुख विषय हैं। एक है संकल्प की विस्मृति और दूसरा है प्रसाद का अपमान। संकल्प की विस्मृति और प्रसाद का अपमान ये दो थीम हैं, जिनके आसपास यह कथा चलती है। संकल्प, जीवन में सत्य उतारने का। इसका प्रसाद क्या है? क्या पंजीरी या शुद्ध घी में बना हुआ हलवा...? वास्तव में श्रीसत्यनारायणव्रतकथा का प्रसाद है ‘सत्य’। तो जीवन में जो भी सत्य को विस्मृत करेगा, जब-जब भी उसको भूल जाएगा, तब-तब परेशानी में पड़ेगा। जीवन में जब-जब भी हम सत्य के प्रसाद का अपमान करेंगे यानी सत्य का अपमान करेंगे, तब-तब हम अपने-आप को संकट में पाएँगे। इस कथा में जो प्रसंग आए हैं यदि उनके भाव को ठीक से समझा जाए तो स्पष्ट सन्देश निकलकर आता है कि यह सत्य के अन्वेषण की कथा है। इसमें विशेषता है कि सत्य के साथ नारायण जोड़े गए हैं। सत्य को नारायण का, भगवान् का टेका, सहारा, आधार और बल दिया गया है।

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    Vijayshankar Mehta

    पं. विजयशंकर मेहता

    जन्म: 2 जुलाई, 1957 को प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. डॉ. वल्लभदासजी मेहता एवं माता सुमित्रा देवी के घर हुआ।

    रसायन शास्त्र में एम.एससी करने के बाद पं. मेहता ने 20 वर्षों तक भारतीय स्टेट बैंक में अपनी सेवाएँ दी थीं। भारत के प्रतिष्ठित हिन्दी समाचार पत्र दैनिक भास्कर समूह से भी आप 20 वर्षों तक जुड़े रहे तथा ब्यूरो प्रमुख, सम्पादक और ब्यूरो सलाहकार के पद पर अपनी सेवाएँ देते हुए अप्रैल 8 में सेवानिवृत्त हुए।

    पिछले 15 वर्षों से पंडितजी विभिन्न विषयों पर व्याख्यान दे रहे थे किन्तु 2004 में सिंहस्थ के पश्चात् स्वामी सत्यमित्रानन्दजी और माँ प्रेमापांडुरंगजी के आशीर्वाद से आपने अपने व्याख्यान के विषयों को जीवन प्रबन्धन से जोड़ा। इसके पश्चात आपको जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानन्दगिरीजी का शिष्यत्व प्राप्त हुआ।

    पिछले 7 वर्षों में पं. विजयशंकर मेहता ने लगभग 900 व्याख्यान देश और विदेश में दिए हैं। श्रीरामकथा, श्रीमद्भागवत, महाभारत, श्रीहनुमानचलीसा, गीता आदि अन्य 25 विषयों पर आपकी सीड़ी देखी व सुनी जा रही तथा उपलब्ध पुस्तकें पढ़ी जा रही हैं।

    पं. विजयशंकर मेहता पिछले दिनों पाकिस्तान यात्रा पर गए थे जहाँ उन्होंने मजहब को जिस्मानी और रूहानी तौर पर अलग-अलग उपयोग के साथ अपने 13 व्याख्यानों में समझाया। पाकिस्तान में हर मजहब के लोगों ने इसे पसन्द किया।

    आधुनिक प्रबन्धन में जो सूत्र आते हैं उन पर अध्यात्म की दृष्टि से बोलने के लिए पंडित मेहता को 2010 एवं 2011 में अफ्रीका बुलाया गया था।

    • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Funda An Imprint of Radhakrishna
    • Korak An Imprint of Radhakrishna

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