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Sampradayik Dange Aur Bhartiya Police

Sampradayik Dange Aur Bhartiya Police

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  • Pages: 126p
  • Year: 2016, 3rd Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: 8171197213
  • ISBN 13: 9788171197217
  •  
    सांप्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस सांप्रदायिक दंगों को प्रशासन की एक बड़ी असफलता के रूप में लिया जाना चाहिए । हाल के वर्षों में इस विषय पर एक व्यापक समझ तैयार करने में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी व प्रतिष्ठित लेखक विभूति नारायण राय का यह अध्ययन बहुत महत्त्वपूर्ण है । श्री राय ने यह अध्ययन नेशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद के लिए एक वर्ष के गहन परिश्रम के बाद पूरा किया था । दुर्भाग्य से, इसकी कुछ स्थापनाओं को छिपाने–दबाने की कोशिश भी की गई । इसको प्रकाश में लाने का श्रेय नेशनल अकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन, मसूरी को जाता है, जिसने इसे सबसे पहले प्रकाशित किया । मेरी राय है कि प्रशासन और पुलिस के तमाम अधिकारियों के लिए इस पुस्तक का पठन–पाठन अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए । पदम रोशा, पुलिस महानिदेशक (सेवानिवृत्त) सांप्रदायिक दंगों के दौरान पुलिस–व्यवहार पर यह एक ठोस, विश्वसनीय और आधिकारिक अध्ययन है–––लेखक का यह कहना एकदम सही है कि पुलिस में काम करने वाले लोग उसी समाज से आते हैं जिसमें सांप्रदायिकता के विषाणु पनपते हैं, उनमें वे सब पूर्वग्रह, घृणा, संदेह और भय होते हैं जो उनका समुदाय किसी दूसरे समुदाय के प्रति रखता है । पुलिस में भर्ती होने के बावजूद वे खुद को अपने ‘सहधार्मिकों’ के ‘हम’ में शामिल रखते हैं और दूसरे समुदाय को ‘वे’ मानते रहते हैं । ए–जी– नूरानी (फ्रंटलाइन में) गृह मंत्रालय और पुलिस ब्यूरो ऑफ रिसर्च एंड डेवलेपमेंट तथा अपने सर्वेक्षण से प्राप्त आँकड़ों के विस्तृत विश्लेषण पर आधारित यह शोध बताता है कि प्रत्येक दंगे के 80 प्रतिशत शिकार मुस्लिम होते हैं और जो लोग गिरफ्“तार किए जाते हैं उनमें भी लगभग 90 प्रतिशत अल्पसंख्यक ही होते हैं । श्री राय के अनुसार, ‘‘यह तर्क–विरुद्ध है । अगर 80 प्रतिशत शिकार मुस्लिम हैं तो होना यह चाहिए कि गिरफ्“तार लोगों में 70 प्रतिशत हिंदू हों । लेकिन ऐसा कभी होता नहीं है ।’’ सिबल चटर्जी (आउटलुक में)

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    Vibhuti Narayan Rai

    विभूति नारायण राय

    जन्म : 28 नवंबर, 1950

    शिक्षा : मुख्य रूप से बनारस और इलाहाबाद में। अंग्रेजी साहित्य से स्नातकोत्तर (1971)।

    प्रकाशित रचनाएँ : घर, शहर में कर्फ्श्यू, किस्सा लोकतंत्र (उपन्यास); एक छात्र-नेता का रोजनामचा (व्यंग्य-संग्रह); साम्प्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस (शोध)।

    प्रतिष्ठित पत्रिका ‘वर्तमान साहित्य’ के संस्थापक संपादक।

    संप्रति : कुलपति, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा।

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