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Chaudah Phere

Chaudah Phere

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  • Pages: 239p
  • Year: 2008
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183610339
  •  
    चौदह फेरे तब केबल टी.वी. के धारावाहिक शुरू नहीं हुए थे और हिन्दी पत्रिकाओं में छपनेवाले लोकप्रिय धारावाहिक साहित्य-प्रेमियों के लिए आकर्षण और चर्चा का वैसे ही विषय थे, जैसे आज के सीरियल। चौदह फेरे जब ‘धर्मयुग’ में धारावाहिक रूप में छपने लगा तो इसकी लोकप्रियता हर किस्त के साथ बढ़ती गई। कूर्मांचल समाज में तो शिवानी को कई लोग चौदह फेरे ही कहने लगे थे। उपन्यास के रूप में इसका अन्त होने से पहले अहिल्या की फैन बन चुकी प्रयाग विश्वविद्यालय की छात्राओं के सैकड़ों पत्र उनके पास चले आए थे, ‘प्लीज, प्लीज शिवाजी जी, अहिल्या के जीवन को दुःखान्त में विसर्जित मत कीजिएगा।’ कैम्पसों में, घरों में शर्तें बदी जाती थीं कि अगली किस्त में किस पात्र का भविष्य क्या करवट लेगा। स्वयं शिवानी के शब्दों में...‘‘मेरे पास इतने पत्र आए कि उत्तर ही नहीं दे पाई। परिचित, अपरिचित सब विचित्र प्रश्न पूछते हैं - ’’ ‘क्या अहिल्या फलाँ समझा गया...इसी भय से गर्मी में पहाड़ जाने का विचार त्यागना पड़ा। क्या पता किसी अरण्य से निकलकर कर्नल साहब छाती पर दुनाली तान बैठें?’’ कूर्मांचल से कलकत्ता आ बसे एक सम्पन्न-कुटिल व्यवसायी और उसकी उपेक्षिता परम्पराप्रिय पत्नी की रूपसी बेटी अहिल्या, परस्पर विरोधी मूल्यों और संस्कृतियों के बीच पली है। उसका राग-विराग और उसकी छटपटाती भटकती जड़ों की खोज आज भी इस उपन्यास को सामयिक और रोचक बनाती है। जाने-माने लेखक ठाकुरप्रसाद सिंह के अनुसार, इस उपन्यास की कथा धारा का सहज प्रवाह और आँचलिक चित्रकला के से चटख बेबाक रंग इस उपन्यासकी मूल शक्ति हैं।

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    Shivani

    हिन्दी साहित्य में शिवानी एक जाना पहचाना नाम है। इन्होनें काफी सारे उपन्यास, कहानियाँ, आलेख और निबन्ध लिखकर हिन्दी साहित्य को अपना योगदान दिया है। इनके लेखन में भावों का सुन्दर चित्रण, भाषा की सादगी तो होती ही थी साथ ही साथ पहाड‌‌‌, वहाँ रहने वाले भोले भाले लोग और वहाँ की संस्कृति का जीता जागता वर्णन होता था। अगर आपने उनका लिखा साहित्य पढ‌ा है तो समझ लीजिये कि कुमाऊँनी तो आप आसानी से समझ लेंगे क्योंकि उनके लेखन में कुमाऊँनी शब्दों और मुहावरों की भरमार रहती थी। उनके शब्दों में,

    मेरा लेखन कोई कल्पना की उड‌ान नही, यह सच्चाई से जुड‌ा है

    शिवानी का जन्म सन् १९२३ में सौराष्ट्र में हुआ, उनके पिता अश्विनी कुमार पांडे रामपुर स्टेट में दिवान थे, वह वायसराय के वार काउंसिल में मेम्बर भी थे। उनकी माता संस्कृत की विदूषी ही नही वरन लखनऊ महिला विधालय की प्रथम छात्रा भी थीं। १९३५ से १९४३ के मध्य उन्होने रविन्द्र नाथ टैगोर के शांति निकेतन में विधा अध्ययन किया और १९५३ में कलकत्ता से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उन्हें गुजराती, बंगाली, संस्कृत, अंग्रेजी और उर्दू का भी अच्छा ज्ञान था। उनके पति एस डी पंत शिक्षा विभाग में थे और दुर्भाग्य से काफी जवानी में उनका निधन हो गया था। शिवानी की तीन बेटियाँ (वीना, मृणाल पांडे, ईरा पांडे – मृणाल और ईरा भी जानी मानी लेखिका हैं) और एक बेटा (मुक्तेश पंत, बच्चों में सबसे छोटा और आजकल अमेरिका में) हैं। शादी के बाद शिवानी का ज्यादा वक्त कुमाऊँ की पहाडियों में ही बीता, बाद में वो लखनऊ में आकर रहने लगी। मार्च २००३ को नई दिल्ली में अपने बच्चों में दीदी के नाम से विख्यात इस ईजा (माँ) का देहांत हुआ।

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