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Chandrakanta

Chandrakanta

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  • Pages: 268P
  • Year: 2016, 3rd Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183615167
  •  
    चन्द्रकांता संतति व्यक्तिगत और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में ‘चन्दकान्ता’ वर्ग के उपन्यासों को देखें तो कथानक के कुछ और ही अर्थ-आयाम सामने आने लगते हैं...सारा उपन्यास दौलत को छिपाने या छिपी दौलत को सही और अधिकारी हाथों सौंपने और हथिया लेने के संघर्ष की महागाथा बनकर सामने आने लगता है। तिलिस्म की परिकल्पना भी इसी दौलत के लिए की गई है और उधर सारी ऐयारी या धोखाधड़ी भी इसी के लिए है...दारोगा, जैपालसिंह, मायारानी और यहाँ तक कि भूतनाथ भी इसीलिए खलनायक हैं, और बीरेन्द्रसिंह, इन्द्रजीत-आनन्दसिंह या उनके साथी इसी के लिए नायक। मोटे रूप में उपन्यास के दो खलनायक हैं - शिवदत्त और दारोगा...शिवदत्त गद्दी से उतारा हुआ राजा है, इसलिए बीते युग के सपने, राज्य वापस लेने के उसके सारे प्रयास, जोड़-तोड़ या साधन इकट्ठे करना या इस सबके लिए धन-दौलत की आकांक्षा बहुत अस्वाभाविक नहीं है। मायारानी, दारोगा और जैपालसिंह के षड्यन्त्रों के शिकार राजा गोपालसिंह भी तो अपनी छिनी हुई गद्दी के लिए बीरेन्द्रसिंह, इन्द्रदेव के साथ मिलकर यही करते हैं। ऊपर ऐयारी, भीतर तिलिस्म। दुहरे धरातल पर चलनेवाली कहानी। ऊपरी चतुराई के समय का सामना करने की कोशिश और भीतर कहीं कुछ बेहद ही कीमती छिपाए होने का सन्तोष। ऊपरी मनोरंजन के पीछे भारतीय अस्मिता के होने और खोज निकालने का विश्वास।

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    Devaki Nandan Khatri

    जन्म: 18 जून, 1861 (आषाढ़ कृष्ण 7, संवत् 1918)। जन्मस्थान: मुजफ्फरपुर (बिहार)।

    बाबू देवकीनन्दन खत्री के पिता लाला ईश्वरदास के पुरखे मुल्तान और लाहौर में बसते-उजड़ते हुए काशी आकर बस गए थे। इनकी माता मुजफ्फरपुर के रईस बाबू जीवनलाल महता की बेटी थीं। पिता अधिकतर ससुराल में ही रहते थे। इसी से इनके बाल्यकाल और किशोरावस्था के अधिसंख्य दिन मुजफ्फरपुर में ही बीते।

    हिन्दी और संस्कृत में प्रारम्भिक शिक्षा भी ननिहाल में हुई। फारसी से स्वाभाविक लगाव था, पर पिता की अनिच्छावश शुरू में उसे नहीं पढ़ सके। इसके बाद 18 वर्ष की अवस्था में, जब गया स्थित टिकारी राज्य से सम्बद्ध अपने पिता के व्यवसाय में स्वतंत्र रूप से हाथ बँटाने लगे तो फारसी और अंग्रेजी का भी अध्ययन किया। 24 वर्ष की आयु में व्यवसाय सम्बन्धी उलट-फेर के कारण वापस काशी आ गए और काशी नरेश के कृपापात्र हुए। परिणामतः मुसाहिब बनना तो स्वीकार न किया, लेकिन राजा साहब की बदौलत चकिया और नौगढ़ के जंगलों का ठेका पा गए। इससे उन्हें आर्थिक लाभ भी हुआ और वे अनुभव भी मिले जो उनके लेखकीय जीवन में काम आए। वस्तुतः इसी काम ने उनके जीवन की दिशा बदली।

    स्वभाव से मस्तमौला, यारबाश किस्म के आदमी और शक्ति के उपासक। सैर-सपाटे, पतंगबाजी और शतरंज के बेहद शौकीन। बीहड़ जंगलों, पहाड़ियों और प्राचीन खँडहरों से गहरा, आत्मीय लगाव रखनेवाले। विचित्रता और रोमांचप्रेमी। अद्भुत स्मरण शक्ति और उर्वर, कल्पनाशील मस्तिष्क के धनी।

    ‘चन्द्रकान्ता’ पहला ही उपन्यास, जो सन् 1888 में प्रकाशित हुआ। सितम्बर, 1898 में लहरी प्रेस की स्थापना की। ‘सुदर्शन’ नामक मासिक पत्र भी निकाला। चन्द्रकान्ता और चन्द्रकान्ता सन्तति (छह भाग) के अतिरिक्त देवकीनन्दन खत्री की अन्य रचनाएँ हैं: नरेन्द्र-मोहिनी, कुसुम कुमारी, वीरेन्द्र वीर या कटोरा-भर खून, काजल की कोठरी, गुप्त गोदना तथा भूतनाथ (प्रथम छह भाग)।

    निधन: 1 अगस्त, 1913

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