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Main Hun Kolkata Ka Foreign Return Bhikhari

Main Hun Kolkata Ka Foreign Return Bhikhari

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  • Pages: 248p
  • Year: 2013
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180318016
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    होश सँभालते ही खुद को सियालदह स्टेशन परिसर में भिखारी के रूप में पाया ! किसी शरणार्थी परिवार में जन्मे उस बालक को अपने माता-पिता की याद नहीं थी, स्टेशन के बाहर पड़े ड्रेन-पाइप में वह रातें गुजारता ! उसकी दुनिया रलवे स्टेशन, ड्रेन-पाइप और आसपास की झ्ग्गी-झोपड़ियों तक सिमित थी ! उसका कोई नाम नहीं था ! राहगीरों द्वारा फेंके गये बीडी की टोटी उठाकर फूंकने की आदत के कारन लोग उसे बीडी कहकर पुकारते ! एक उस्ताद से पाकिटमारी, उठाईगीरी आदि सीखकर इस कला को आजमाने के प्रयास में वह पहले दिन ही पकड़ा गया ! उसे कुछ दिनों तक परखने के बाद अपने घरेलू नौकर के रूप में रख लिया ! वहां उसने रसोई का काम सीखा ! एक शिक्षक ने उसे पढ़ने की जिम्मेदारी ली ! दाआबू अकसर अपने काम से अमेरिका या यूरोप के दौरे पर चले जाते, तब बीडी के पास ख़ास काम ण रहता ! वह या तो कहीं जाकर भीख मांगने बैठता या किसी बांग्लादेशी के रेस्तरां में पार्ट-टाइम काम करता या पार्क में बैठकर बीडी फूंकता ! ऐसे में दाआबू ने उसे डायरी लिखने को कहा, बोले कि वह रोज के अनुभवों को अपनी भाषा में लिखना शरू करे ! हां, उसे एत्रिस नाम की एक सुंदरी अंग्रेज युवती से प्रेम भी हो गया था, जिसमें दाआबू को आपत्ति नहीं थी ! भारतीय और पाश्चात्य समाज व्यवस्था में अंतर, वहां का रहन-सहन, उन्मुक्त प्रेम, ड्रग का कहर, स्कूल ड्राप आउट्स, बेकार भत्ता, अमीरों का कुत्ता प्रेम, आवारागर्द युवा वर्ग का जीवन, शराब, सेक्स, एक्स-मॉस पर्व, बड़े क्लुबों की डिनर पार्टी....कुल मिलकर बहुत कुछ था बीडी के पास लिखने के लिए !...

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    Bimal De

    बिमल दे

    जन्म सन 1940, कोल्कता में ! बचपन से बंधनमुक्त होकर घर से भागकर बहुत बार हिमालय का चक्कर लगाया ! 1956 में जब तिब्बत का दरवाजा विदेशियों के लिये लगभग बंद हो चूका था, एक नेपाली तीर्थयात्री दल में शरीक होकर तमाम अडचनों से जूझता हुआ बिमल ल्हासा से कैलास तक की यात्रा कर आया !

    बिमल 1967 में साइकिल पर विश्व-भ्रमण के लिए निकला ! एक पुराणी साइकिल, जेब में कुल अठारह रूपये, मन में अदम्य उत्साह और साहस, यही उसकी पूँजी थी ! रस्ते में छिटपुट काम कर रोटी का जुगाड़ करगा, फिर आगे बढ़ता ! इस तरह पांच साल तक दुनिया की सैर करने के बाद वह 1972 में भारत लौटा ! इन यात्राओं का विवरण ‘दूर का प्यासा’ नामक ग्रन्थ में उसने 7 खंडो में लिखा ! बिमल सन 1972 से 1980 तक मुख्यतः पर्वतारोही पर्यटक के रूप में विश्व के पर्वतीय स्थलों की यात्रा करता रहा ! 1981 से 1998 के बीच उसने तीन बार उत्तरी ध्रुव और दो बार दक्षिणी ध्रुव की यात्रा की ! उसके अन्य ग्रन्थ हैं महातीर्थ के अंतिम यात्री व् सूर्य प्रणाम !

    फ्रांस की संस्थाओं ने तथा वाशिंगटन के नेशनल गेओग्रफिक सोसाइटी ने बिमल को कई बार सम्मानित किया है ! बिमल अमेरिकी पोलर सोसाइटी का आजीवन सदस्य है तथा ब्रितानवी पोलर सोसाइटी का परामर्शदाता भी ! अपने ढंग का अनूठा पर्यटक और दार्शनिक होने के साथ ही बिमल एक मानव प्रेमी है और वह निरंतर जनहितकार कार्यों में जुटा रहता है !

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