• (011) 23274463
  • Help
INR
 
Shopping Cart (0 item)
My Cart

You have no items in your shopping cart.

You're currently on:

Surya Pranam

Surya Pranam

Availability: In stock

-
+

Regular Price: Rs. 175

Special Price Rs. 157

10%

  • Pages: 320p
  • Year: 2012
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180317378
  •  
    ' सूर्य प्रणाम, का स्थान-काल, पात्र तथा घटनाएं सभी वास्तविक हैं । मैं पर्यटक हूँ वास्तविक घटनाओं का उल्लेख करना ही मेरा धर्म है । यथार्थ के वर्णन में एकरसता आ जाती है । मैं एक पथिक हूँ अपनी यात्राओं के दौरान जो भी मैं देखता हूँ मुझे जो अनुभव होता है, उसी को मैं अपने पाठकों तक पहुँचाने का प्रयत्न करता हूँ । मैंने अपनी यात्राओं के दौरान बहुत से मंदिर, मठ और पूजास्थल देखे हैं, बहुत से तीर्थों में जाकर शीश नवाया है । हिमालय के बहुतेरे तीर्थस्थलों में मैंने देव-स्पर्श पाया, हिमालय की पुण्यभूमि में ही पुण्यात्माओं का आविर्भाव संभव है । एंडीज की यात्रा ने मुझे तपस्या की अंतिम सोपान पर पहुँच दिया था । एडीज तथा मध्य व दक्षिणी अमरीका की प्राचीन सभ्यता में ज्यों सूर्य को मूल देवता का स्थान प्राप्त था त्यों ही जापान का मूल देवता भी सूर्य है । जापान के सम्राट को सूर्य का प्रतिनिधि मानते हैं, जापानी पताका का प्रतीक चिह्न भी सूर्य है । सूर्य का प्रभाव जापानियों के चरित्र में भी दिखायी देता है । सूर्य शक्ति और ओज का प्रतीक है । सूर्य प्रणाम ग्रंथ सूर्य-देवता के प्रति मेरा अर्घ है । सूर्य को देवता मानने वाले जापान और एंडीज में मैंने जो कुछ देखा, सुना और जाना, उसी अनुभव को मैं इस लेखन के जरिये अपने पाठकों तक पहुँचा रहा हूँ । इसी पुस्तक की भूमिका से

    Customer Reviews

    There are no customer reviews yet.

    Write Your Own Review

    Bimal De

    बिमल दे

    जन्म सन 1940, कोल्कता में ! बचपन से बंधनमुक्त होकर घर से भागकर बहुत बार हिमालय का चक्कर लगाया ! 1956 में जब तिब्बत का दरवाजा विदेशियों के लिये लगभग बंद हो चूका था, एक नेपाली तीर्थयात्री दल में शरीक होकर तमाम अडचनों से जूझता हुआ बिमल ल्हासा से कैलास तक की यात्रा कर आया !

    बिमल 1967 में साइकिल पर विश्व-भ्रमण के लिए निकला ! एक पुराणी साइकिल, जेब में कुल अठारह रूपये, मन में अदम्य उत्साह और साहस, यही उसकी पूँजी थी ! रस्ते में छिटपुट काम कर रोटी का जुगाड़ करगा, फिर आगे बढ़ता ! इस तरह पांच साल तक दुनिया की सैर करने के बाद वह 1972 में भारत लौटा ! इन यात्राओं का विवरण ‘दूर का प्यासा’ नामक ग्रन्थ में उसने 7 खंडो में लिखा ! बिमल सन 1972 से 1980 तक मुख्यतः पर्वतारोही पर्यटक के रूप में विश्व के पर्वतीय स्थलों की यात्रा करता रहा ! 1981 से 1998 के बीच उसने तीन बार उत्तरी ध्रुव और दो बार दक्षिणी ध्रुव की यात्रा की ! उसके अन्य ग्रन्थ हैं महातीर्थ के अंतिम यात्री व् सूर्य प्रणाम !

    फ्रांस की संस्थाओं ने तथा वाशिंगटन के नेशनल गेओग्रफिक सोसाइटी ने बिमल को कई बार सम्मानित किया है ! बिमल अमेरिकी पोलर सोसाइटी का आजीवन सदस्य है तथा ब्रितानवी पोलर सोसाइटी का परामर्शदाता भी ! अपने ढंग का अनूठा पर्यटक और दार्शनिक होने के साथ ही बिमल एक मानव प्रेमी है और वह निरंतर जनहितकार कार्यों में जुटा रहता है !

    • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Funda An Imprint of Radhakrishna
    • Korak An Imprint of Radhakrishna

    Location

    Address:1-B, Netaji Subhash Marg,
    Daryaganj, New Delhi-02

    Mail to: info@rajkamalprakashan.com

    Phone: +91 11 2327 4463/2328 8769

    Fax: +91 11 2327 8144