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  1. Smriti Ki Rekhaye

    Smriti Ki Rekhaye

    Regular Price: Rs. 95

    Special Price Rs. 71

    25%

    स्मृति की रेखाएँ महादेवी मूलतः कवयित्री हैं, परंतु उन्होंने गद्य में भी श्रेष्ठ लेखन किया। विशेष बात यह है कि हिंदी साहित्य में उनके रेखाचित्र जिस शिखर पर खड़े हैं, उन्हें छूनेवाला आज तक कोई नहीं हुआ। एक महादेवी ही हैं, जिन्होंने गद्य में भी कविता के मर्म की अनुभूति कराई और ‘गद्यं कवितां निकषं वदन्ति’ को चरितार्थ किया। स्मृति की रेखाएँ में निरंतर जिज्ञासाशील महादेवी ने अपनी स्मृति के आधार पर अमिट रेखाओं द्वारा अत्यंत सहृदयतापूर्वक जीवन के विविध रूपों को चित्रित कर पात्रों को अमर कर दिया है। महादेवी ने अपने अधिकांश रेखाचित्रों में निम्नवर्गीय पात्रों की विशेषताओं, दुर्बलताओं और समस्याओं का चित्रण किया है। वृद्ध ‘भक्तिन’ की प्रगल्भता तथा स्वामि-भक्त ‘चीनी युवक’ की करुण मार्मिक जीवन-गाथा, पर्वत के कुली ‘जंगबहादुर’ की कर्मठता और फिर ‘मुन्नू’, ‘ठकुरी बाबा’, ‘बिबिया’ तथा ‘गुँगिया’ जैसे चरित्रों की मर्मस्पर्शी जीवन-झाँकियाँ पाठक को अभिभूत कर देने में सक्षम हैं।

    Out of stock

  2. Ateet Ke Chalchitra

    Ateet Ke Chalchitra

    Regular Price: Rs. 95

    Special Price Rs. 85

    11%

    अतीत के चल-चित्र सभी रेखा-चित्रों को महादेवी ने अपने जीवन से ही लिया है, इसीलिए इनमें उनके अपने जीवन की विविध घटनाओं तथा चरित्र के विभिन्न पहलुओं का प्रत्यारोपण अनायास ही हुआ है। उन्होंने अनुभूत सत्यों को जस-का-तस अंकित किया है। महादेवी के रेखा-चित्रों की यह विशेषता भी है कि उनमें चरित्र-चित्रण का तत्त्व प्रमुख रहा है और कथ्य उसी का एक हिस्सा मात्र है। इनमें गंभीर लोकदर्शन का उद्घाटन होता चलता है, जो हमारे जीवन की सांस्कृतिक धारा की ओर इंगित करता है। ‘अतीत के चल-चित्र’ में सेवक ‘रामा’ की वात्सल्यपूर्ण सेवा, भंगिन ‘सबिया’ की पति-परायणता और सहनशीलता, ‘घीसा’ की निश्छल गुरुभक्ति, साग-भाजी बेचने वाले अंधे ‘अलोपी’ का सरल व्यक्तित्व, कुम्हार ‘बदलू’ व ‘रधिया’ का सरल दाम्पत्य प्रेम तथा पहाड़ की रमणी ‘लक्षमा’ का महादेवी के प्रति अनुपम प्रेम, यह सब प्रसंग महादेवी के चित्रण की अकूत क्षमता का परिचय देते हैं।

    Out of stock

  3. Premchand Ki Sampoorna Kahaniyan (Vol. 1)

    Premchand Ki Sampoorna Kahaniyan (Vol. 1)

    Regular Price: Rs. 300

    Special Price Rs. 225

    25%

    प्रेमचंद की संपूर्ण कहानियाँ-1 प्रेमचन्द जब कथा के मंच पर आए, वे भारत की अपनी कथा परंपरा से तो परिचित थे ही, उर्दू और अरबी-फ़ारसी के किस्सों और अफसानों की भी उनको पूरी जानकारी थी। पश्चिम के कथा-लेखकों को भी उन्होंने पढ़ा था। बावजूद इसके उनकी रचनाएँ कथा-लेखन के किसी निश्चित रूप में ढलने के बजाय, अभिव्यक्ति के उनके अपने दृष्टिकोण की अनुरूपता में सामने आईं, कि कहानी को पारदर्शी होना चाहिए, वह सारगर्भित हो और अपने संवेदनात्मक उद्देश्य को पाठक तक भलीभाँति संप्रेषित कर पाने में समर्थ हो। प्रेमचन्द की कहानियों के रचना-शिल्प की बुनियादी विशेषता यह है कि वह कहीं से भी, किसी भी कोण से, आयासजन्य नहीं है। नितांत सहज और साधारण है। यह सहजता और साधारणता ही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है। प्रेमचन्द ने अपनी कहानियों के रचना-शिल्प में घटनाओं के बजाय स्थितियों और संदर्भों को ज्यादा महत्व दिया है। उनकी कहानियाँ इसी नाते घटना-प्रधान कहानियाँ नहीं हैं और न ही घटना-प्रधान कहानियों की तरह वे पाठकों में कौतूहल या जिज्ञासा वृत्ति उपजाती हैं। उनकी कहानियों का पाठक ‘आगे क्या होगा’ की जिज्ञासा के बजाय चित्रित स्थितियों और प्रसंगों के बीच से उभरते हुए प्रेमचन्द के संवेदनात्मक उद्देश्य के साथ हो जाता है और उसके विकास में रुचि लेने लगता है। प्रेमचन्द अपने पाठक को अपनी संवेदना के वृत्त में इस तरह ले लेते हैं कि वह उनकी बुनी हुई स्थितियों और उनके रचे चरित्रों के साथ-साथ आगे बढ़ता जाता है। वह कहानीकार का हमसफर बन जाता है। प्रेमचन्द की कहानियों के रचना-शिल्प को बारीकी से देखें तो स्पष्ट होगा कि प्रेमचन्द एक रचनाकार के रूप में कहानी में अनावश्यक दखल नहीं देते। वे अपने संवेदनात्मक उद्देश्य को कहानी में बुनी गई स्थितियों और प्रसंगों के माध्यम से उजागर करते हैं और चूँकि इन स्थितियों और प्रसंगों का सम्बन्ध उनकी कल्पना से न होकर जीवन के यथार्थ और जीवन की सच्चाइयों से होता है, अतएव पाठक के दिल-दिमाग में उनकी विश्वसनीयता आप से आप अंकित हो जाती है। - शिवकुमार मिश्र
  4. Premchand Ki Sampoorna Kahaniyan (Vol. 1)

    Premchand Ki Sampoorna Kahaniyan (Vol. 1)

    Regular Price: Rs. 800

    Special Price Rs. 600

    25%

    प्रेमचंद की संपूर्ण कहानियाँ-1 प्रेमचन्द जब कथा के मंच पर आए, वे भारत की अपनी कथा परंपरा से तो परिचित थे ही, उर्दू और अरबी-फ़ारसी के किस्सों और अफसानों की भी उनको पूरी जानकारी थी। पश्चिम के कथा-लेखकों को भी उन्होंने पढ़ा था। बावजूद इसके उनकी रचनाएँ कथा-लेखन के किसी निश्चित रूप में ढलने के बजाय, अभिव्यक्ति के उनके अपने दृष्टिकोण की अनुरूपता में सामने आईं, कि कहानी को पारदर्शी होना चाहिए, वह सारगर्भित हो और अपने संवेदनात्मक उद्देश्य को पाठक तक भलीभाँति संप्रेषित कर पाने में समर्थ हो। प्रेमचन्द की कहानियों के रचना-शिल्प की बुनियादी विशेषता यह है कि वह कहीं से भी, किसी भी कोण से, आयासजन्य नहीं है। नितांत सहज और साधारण है। यह सहजता और साधारणता ही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है। प्रेमचन्द ने अपनी कहानियों के रचना-शिल्प में घटनाओं के बजाय स्थितियों और संदर्भों को ज्यादा महत्व दिया है। उनकी कहानियाँ इसी नाते घटना-प्रधान कहानियाँ नहीं हैं और न ही घटना-प्रधान कहानियों की तरह वे पाठकों में कौतूहल या जिज्ञासा वृत्ति उपजाती हैं। उनकी कहानियों का पाठक ‘आगे क्या होगा’ की जिज्ञासा के बजाय चित्रित स्थितियों और प्रसंगों के बीच से उभरते हुए प्रेमचन्द के संवेदनात्मक उद्देश्य के साथ हो जाता है और उसके विकास में रुचि लेने लगता है। प्रेमचन्द अपने पाठक को अपनी संवेदना के वृत्त में इस तरह ले लेते हैं कि वह उनकी बुनी हुई स्थितियों और उनके रचे चरित्रों के साथ-साथ आगे बढ़ता जाता है। वह कहानीकार का हमसफर बन जाता है। प्रेमचन्द की कहानियों के रचना-शिल्प को बारीकी से देखें तो स्पष्ट होगा कि प्रेमचन्द एक रचनाकार के रूप में कहानी में अनावश्यक दखल नहीं देते। वे अपने संवेदनात्मक उद्देश्य को कहानी में बुनी गई स्थितियों और प्रसंगों के माध्यम से उजागर करते हैं और चूँकि इन स्थितियों और प्रसंगों का सम्बन्ध उनकी कल्पना से न होकर जीवन के यथार्थ और जीवन की सच्चाइयों से होता है, अतएव पाठक के दिल-दिमाग में उनकी विश्वसनीयता आप से आप अंकित हो जाती है। - शिवकुमार मिश्र

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