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Yeh Bhumandal Ki Raat Hai

Yeh Bhumandal Ki Raat Hai

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  • Pages: 121p
  • Year: 2009
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126716692
  •  
    कविता की यात्रा में अकसर ही कुछ ऐसा होता है जो छूटता जाता है, उसी को समेटते-सहेजते हुए फिर एक और कवि आता है, और समकालीन रचनात्मकता के अधूरे परिदृश्य को पूरा करता है। पंकज राग का यह संग्रह और उनकी कविताएँ यही काम करती दिखती हैं। न सिर्फ विषयों और शीर्षकों में, बल्कि भाषा के प्रयोग और बिम्बों-प्रतीकों के मुखौटों में भी वे उन चीजों और भंगिमाओं को पकड़ने की कोशिश करते हैं जो सिर्फ उनकी अपनी खोज हैं। ”दिन बड़ा अजीब-सा गुजरे/शाम बड़ी थकी-थकी सी हो/भूख हो पर लगे नहीं/हरारत हो पर दिखे नहीं/बातें सतरंगी करो/यह भूमंडल की रात है।“ संग्रह की पहली और शीर्षक-कविता की शुरुआती ये पंक्तियाँ कवि की विशिष्टता की भूमिका की तरह पाठक के मन में गड़ जाती हैं, जिसका निर्वाह यह संग्रह अन्त तक करता है। पंकज राग की ये कविताएँ उन चिन्ताओं को तो देखती ही हैं जो आज हम सबके लिए निर्णायक विषय बनी हुई हैं, साथ ही वे उन पीड़ाओं को भी अनदेखा नहीं करतीं जो हमारे अतीत में गुजरी हैं और आज हमारी स्मृतियों में कसकती हैं। ‘दिल्ली: शहर दर शहर’ जो इस संग्रह की सबसे लम्बी कविता है, वर्तमान और अतीत का ऐसा ही महाआख्यान बुनती है, जिसमें कवि एक शहर की नियति के बहाने मनुष्य की ही नियति से दो-चार होता है। ”तुम मुझे फ़ीरोज़ी बना दो/दिल्ली की उस मध्यवर्गीय लड़की ने अपने पास बैठे लड़के से कहा/कोटला फ़ीरोजश्शाह के स्लेटी खंडहरों के बीच/उस लड़के का उत्तर फँस सा गया/फिर इन दोनों की कहानी का कुछ नहीं हुआ/वैसे ही जैसे फ़ीरोज़ाबाद का भी कुछ न हो सका।“ अतीत से वर्तमान तक व्याप्त मनुष्य के अधूरेपन की निशानदेही करती ये कविताएँ निश्चित रूप से पाठकों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव साबित होंगी।

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    Pankaj Rag

    पंकज राग

    मुज़फ्फरपुर (बिहार) में जन्मे पंकज राग ने सेंट स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली से इतिहास विषय में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। तत्पश्चात् उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से आधुनिक भारतीय इतिहास में एम.फिल. की उपाधि प्राप्त की तथा दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग डेढ़ वर्ष तक अध्यापन किया। 1990 में वे भारतीय प्रशासनिक सेवा (मध्य प्रदेश संवर्ग) में आए।

    पंकज राग ने पुरातत्त्वविज्ञान, अभिलेखागार एवं संग्रहालय आयुक्त, मध्य प्रदेश सरकार के रूप में भी अपनी सेवा प्रदान की है। उन्होंने निदेशक, भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे तथा मध्य प्रदेश सरकार में अन्य महत्त्वपूर्ण पदों को सुशोभित

    किया है।

    एक संगीत विशेषज्ञ के रूप में, पंकज राग ने फिल्मों और संस्कृति पर गहन शोध किया है और सन् 1931 से 2005 तक के फिल्म संगीत निर्देशकों पर आधारित उनकी पुस्तक धुनों की यात्रा बहुचर्चित रही है। वे प्रख्यात हिन्दी कवि हैं। उनके कविता-संग्रह यह भूमंडल की रात है पर उन्हें प्रतिष्ठित केदार सम्मान, मीरा स्मृति सम्मान और स्पन्दन कृति सम्मान प्राप्त हुआ है। रूपा एंड कम्पनी से प्रकाशित अपनी कृति 1857 : दी ओरल ट्रैडिशन में उन्होंने लोकगीतों एवं लोककथाओं के माध्यम से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को पुनर्सृजित किया है।

    उनकी अन्य कृतियाँ हैं—विन्टेज मध्य प्रदेश, भोपाल 50 इयर्स, मास्टर पीसेज ऑफ मध्य प्रदेश, राग-रागिनी फोलियो, रायसेन का पुरातत्त्व, राजगढ़ का पुरातत्त्व, मंदसौर का पुरातत्त्व, नोन एंड अननोन : एन इंसाइक्लोपीडिया ऑफ मॉन्यूमेंट्स ऑफ मध्य प्रदेश आदि। फिलहाल वे भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय में संयुक्त सचिव एवं महानिदेशक, राष्ट्रीय अभिलेखागार के पद पर कार्यरत हैं।

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