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Ye Kohre Mere Hain

Ye Kohre Mere Hain

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  • Pages: 184p
  • Year: 1998
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8171782817
  •  
    ये कोहरे मेरे हैं में संकलित भवानी भाई कं।, 1954 -55 से लेकर 197०-71 की डायरियों में लिखी, वे प्रेम- कविताएँ हैं, जो पहली बार यहाँ एक साथ. प्रकाशित हो रही हैं । ' 'ये ठेठ प्रेम-कविताएँ हैं और कवि ने इनके माध्यम से अपने जीवनानुभवों और काव्य-बोध को निरंतर विकसित, विस्तृत और सुसंपन्न किया है । मानव-स्वभाव की सरलता और जटिलता, रंगीनी और सादगी का जैसा जोड़-तोड़ यहाँ प्रतिफलित है, उससे यह ' भी सूचित होता है कि भावों के सुसंस्कार में विचारों की भूमिका किस कोटि का योगदान करती है और कविता कैसे-कैसे झड़े-तिरछे रास्तों और उतार-चढ़ावों से होकर अपना साज-सँवार पाती है । निश्चय ही इन कविताओं में कवि ने अपने व्यक्तित्व के उस पक्ष को दर्ज किया है, जो न तो स्वतंत्रताप्रेमी आंदोलनकारी का है, न ही जोशो-खरोश से लबालब भरे आदर्शवादी का । ' 'इनमें मानवीय रिश्तों का एक खूबसूरत सपना देखने की कोशिश है जो किसी भी श्रेष्ठ कविता से सहज अपेक्षित है । कहने को ये सपने बहुत आमफहम और मामूली हैं, किंतु वास्तविक जीवन में इनकी परिणति इन दिनो लगभग असभव हो उठी हे । ' 'इनमें एक आदमी का दूसरे आदमी ३ पास तनिक देर बैठकर अपना दुख-दर्द कह डालने की इच्छा, परस्पर के नेह-बंधन में बँधकर आकाश-भर विस्तार पाने की आकांक्षा, जीवन की भागम-भाग और निरंतर मशीनी और औपचारिक होते संबंधों के विरोध में सघन परिचय और आत्मीयता की बारादरी सजाने का सपना झिलमिला रहा है । ''

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    Bhawani Prasad Mishra

    बीसवीं सदी की हिन्दी कविता में अपने अलग काव्य-मुहावरे और भाषा-दृष्टि के साथ-साथ स्वदेशी चेतना की तेजस्विता और कविता की प्रतिरोधक आवाज की पहचान बने कविश्री भवानी प्रसाद मिश्र का जन्म 29 मार्च, 1913 को जिला होशंगाबाद के नर्मदा-तट के एक गाँव टिगरिया में हुआ। 1930 में उन्होंने लिखा—'जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख।’

    जीवन की शुरुआत मध्य प्रदेश के ही बैतूल जिले में एक पाठशाला खोलकर किन्तु सन् बयालीस के भारत छोड़ो आन्दोलन में लगभग तीन साल का कैदी जीवन बिताने के बाद गांधी और उनके सहयोगियों के साथ रहे। कुछेक दिनों तक 'कल्पना’ (हैदराबाद) में। फिल्मों और आकाशवाणी में काम। इसके बाद सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय के हिन्दी खंड के सम्पादक। बाद में गांधी मार्ग जैसी विशिष्ट पत्रिका के सम्पादक के रूप में साहित्यिक पत्रकारिता की एक रचनात्मक धारा का प्रवर्तन करते रहे।

    20 फरवरी, 1985 को गृहनगर नरसिंहपुर में हृदयाघात से आकस्मिक मृत्यु।

    भवानी प्रसाद मिश्र रचनावली के कुल आठ खंडों के अलावा कवि के अन्य चर्चित कविता-संग्रह हैं—गीत फरोश, चकित है दुख, गान्धी पंचशती, बुनी हुई रस्सी, खुशबू के शिलालेख, त्रिकाल सन्ध्या, व्यक्तिगत, परिवर्तन जिए, तुम आते हो, इदम् न मम्, शरीर कविता : फसलें और फूल, मानसरोवर दिन, सम्प्रति, अँधेरी कविताएँ, तूस की आग, कालजयी, अनाम और नीली रेखा तक।

    बाल कविताएँ—तुकों के खेल; संस्मरण—जिन्होंने मुझे रचा; निबन्ध संग्रह—कुछ नीति कुछ राजनीति।

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