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Udarikaran Ka Sach

Udarikaran Ka Sach

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  • Pages: 148p
  • Year: 2008
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788171785612
  •  
    199० में उभरे गंभीर आर्थिक संकट ने भारत सरकार को दूरगामी आर्थिक सुधारों के रास्ते पर ला खड़ा किया । नीतिगत सुधार किए गए, नियंत्रित अर्थव्यवस्था में खुलापन लाया गया । इन मुद्दों पर थोड़ी-बहुत बहस भी चली लेकिन प्रमुख मुद्दों को अनदेखा किया गया । ही, राजनीतिक लाभ-हानि के आधार पर तर्क, तर्क कम थे, वादे अधिक थे । लिहाजा उदारीकरण का सच ओझल ही रहा । विद्वान लोग वाग्जाल रचते रहे । सरकार मायाजाल फैलाती रही । सुनहरे सपनों, छिपी लालसाओं और कामनाओं को बढ़ावा दिया गया । पर जनसाधारण के लिए उदारीकरण आज भी अबूझ पहेली बना हुआ है । उदारीकरण क्या जन-विरोधी है? क्या उदारीकरण सिर्फ जन-विरोधी है या उसके कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं? भारत जैसे विकासशील देश में उदारीकरण की जरूरत है? क्या वह जनसाधारण के जीवन को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है? उदारीकरण क्या वैसा ही होना चाहिए जैसा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष या विश्व बैंक बताता है? उदारीकरण के सच को उजागर करने में इन सवालों का जवाब ढूँढ़ना जरूरी है । भारत के दो अग्रणी अर्थशास्त्री अमित भादुड़ी और दीपक नैयर इन्हीं सवालों से टकराते हैं । उनका नजरिया न वामपंथी, न दक्षिणपंथी बल्कि लोकपंथी है । वे शंका ही नहीं करते, वैकल्पिक समाधान भी सुझाते हैं । अर्थशास्त्र के जटिल और अधुनातन पहलू पर लिखी गई यह पुस्तक आर्थिक-तकनीकी शब्दाडंबरों से मुक्त है । सुगम विश्लेषण और सहज भाषा के बल पर यह पुस्तक जनसाधारण और विद्वज्जनों के बीच समान रूप से समादर पाएगी । अमित भादुड़ी की शिक्षा कलकत्ता तथा अमरीका के मैसाचुसेट्‌स इंस्टीट्‌यूट ऑफ टैक्नोलोजी में हुई और कैम्बि्रज विश्वविद्यालय से 1967 में उन्होंने पी-एच. डी. की उपाधि अर्जित की । इस समय वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक हैं, परंतु इससे पूर्व उन्होंने आस्ट्रिया, जर्मनी, इटली, नार्वे, स्वीडेन तथा अमरीका के अनेक संस्थानों तथा विश्वविद्यालयों में शोध तथा अध्यापन कार्य किया है । आप राष्ट्रसंघ की कई संस्थाओं में विशेषज्ञ तथा शोध सलाहकार रहे हैं, और यूरोपियन कमीशन ऑन अनएम्‍प्‍लॉयमेंट तथा कमीशन फॉर रूरल फायनेंस जैसे अंतर्राष्ट्रीय कमीशनों के सदस्य रहे हैं । उनकी तीन पुस्तकें- 'दि इकॉनॉमिक स्ट्रक्चर ऑव बैकवर्ड एग्रीकल्चर, मैक्रो इकॉनामिक्स : दि डायनेमिक्स ऑफ प्रोडक्शन' तथा 'अनकन्वेंशनल इकॉनॉमिक एक्सेस' -और ख्यातिप्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में 5० के लगभग लेख प्रकाशित हो चुके हैं । दीपक नैयर की शिक्षा दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज तथा ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के बैलिमोल कॉलेज में हुई जहाँ वह रोइस स्कॉलर थे । वह कुछ समय तक भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहे और फिर भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय में इकॉनॉमिक एडवाइजर के रूप में कार्य किया । इसके बाद वह भारत सरकार के चीफ इकॉनॉमिक एडवाइजर और वित्त मंत्रालय में सेक्रेटरी रहे । अनेक लेखों के अतिरिक्त उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं : 'इंडियाज एक्सपोर्ट्स एंड एक्सपोर्ट पॉलिसीज', 'इकॉनॉमिक रिलेशन्स बिटवीन सोशलिस्ट कंट्रीज एंड दि थर्ड वर्ल्ड', 'माइग्रेशन, रेमिटेंसेज एंड कैपिटल फ्लोज तथा 'इकॉनॉमिक लिबरलाइजेशन इन इंडिया' ।

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    Amit. Bhaduri

    Amit. Bhaduri

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