• (011) 23274463
  • Help
INR
 
Shopping Cart (0 item)
My Cart

You have no items in your shopping cart.

You're currently on:

Stree: Yaunikta Banam Aadhyatmikta

Stree: Yaunikta Banam Aadhyatmikta

Availability: In stock

-
+

Regular Price: Rs. 200

Special Price Rs. 180

10%

  • Year: 2010
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126719129
  •  
    हिन्दी में विमर्श-ग्रन्थों की दुर्दशा का एक कारण आत्ममंथन की जगह आत्मश्लाघा का होना है। छोटे-बड़े मंचों पर बड़ी-बड़ी बातें अवश्य की जाती हैं, पर रूढ़ियों में जकड़े व्यक्ति की नीयत उसकी देह-भाषा और बातचीत से जाहिर हो ही जाती है। हिन्दी में उपलब्ध ज्यादातर विमर्श-ग्रन्थों का यही द्वन्द्व है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति-केन्द्रित अनुभवों से ऊपर उठकर समष्टि मनुष्य के व्यापक हित की ओर ध्यान केन्द्रित करने की जरूरत है। आज प्रचलित सभी विमर्शों में स्त्री-विमर्श अपने सर्वव्यापी वैचारिक महत्त्व के कारण सबसे महत्त्वपूर्ण है। इसका ताल्लुक संसार की आधी आबादी से है। वह आबादी जिसकी रचनात्मकता के सक्रिय योगदान से यह दुनिया अभी तक वंचित रही आई है; और जिसके योगदान को रेखांकित करने की कोई प्रविधि पुरुष की मनीषा ने अभी तक ईजाद नहीं की। आज के स्त्री-विमर्श का यह दायित्व है कि वह सभी वर्गों के लोगों की चेतना को इस दिशा में संवेदित करे। स्त्री-विमर्श का सचेतन प्रयास होना चाहिए कि सांस्कृतिक जन-जीवन को समग्रता के साथ ग्रहण कर समष्टि चिन्तन को व्यापक रूप दिया जाए। प्रस्तुत किताब इसी प्रयास को महत्ता के साथ रेखांकित करती है। यह किताब स्पष्ट करती है कि स्त्री-विमर्श के साथ मनुष्य-जीवन के सभी पक्षों व विषयों का उचित समायोजन हो, क्योंकि स्त्री-पक्ष और स्त्री-चिन्तन का सतत पुनर्वाचन एक ऐतिहासिक जरूरत है। विज्ञान और संचार-क्रान्ति की सम्भावनाओं में डूबते-उतराते ‘सांस्कृतिक-जनजीवन’ के समक्ष यह किताब स्त्री-विमर्श की राह को प्रशस्त तो करती ही है, साथ ही यह उम्मीद भी करती है कि खुद के साथ समस्त जीवों की संवेदनात्मक तपिश व वैचारिक उधेड़बुन से उपजे कुछ तथ्य सामने आएँ, ताकि स्त्री-विमर्श को नव-अन्तरानुशासिक मार्ग से आगे बढ़ाया जा सके। इसमें संदेह नहीं कि समकालीन स्त्री-चिन्तन, लिंग-संवेदना, स्त्री-प्रकृति, स्त्री-यौनिकता, देह-विमर्श, सांस्कृतिक संक्रमण, सिनेमा आदि विषयों के समायोजन में हिन्दी में यह पहला प्रयास है। भारत के विकास की समस्याएं और समाधान ‘भारत के विकास की समस्याएँ और समाधान’ राष्ट्र की ज्वलंत समस्याओं पर लेखों का संग्रह है। इसमें जीवन, समाज एवं प्रबंधन के उन सभी आयामों को स्पर्श किया गया है जो विकास के अपरिहार्य अंश हैं। यह पुस्तक अपने में सम्पूर्ण है तथा भारत के लिए उन ठोस उपायों का पथ-प्रदर्शन करती है जिनके आधार पर वर्तमान विषम परिस्थितियों का शक्तिशाली ढंग से मुकाबला किया जा सकता है। इस कृति में गहन विश्लेषण एवं व्यावहारिकता का समन्वय है। लेखक के अनुसार भारत के विकास के महायज्ञ में सभी का योगदान समान रूप से अपेक्षित है। केवल सरकार पर आश्रित होना अन्याय होगा। आशा है कि नीति नियोजक, नेतृवृंद, प्रशासक, कर्मचारी, पंचायतों तथा नगरपालिकाओं के प्रतिनिधि तथा भारतीय जनगण इन लेखों से प्रेरणा ग्रहण करके स्वतंत्रता-प्राप्ति के साठ वर्षों बाद वाले नए भारत का निर्माण करेंगे जो स्वदेशी पथ पर चलकर आधुनिक विश्व-प्रतियोगिता में अग्रणी होगा।

    Customer Reviews

    There are no customer reviews yet.

    Write Your Own Review

    Pramila K. P

    श्रीशंकराचार्य विश्वविद्यालय, कालडी में कार्यरत।

    हिन्दी, मलयालम और अंग्रेजी में लेखन और अनुवादकार्य।

    हिन्दी में आलोचनात्मक किताबें : विमर्श और विस्तार 2011, स्त्री अस्मिता और समकालीन कविता 2010, स्त्री: यौनिकता बनाम आध्यात्मिकता 2010, कविता का स्त्रीपक्ष 2008, भाषान्तरण-भावान्तरण 2007, स्त्रीमुक्ति और कविता 2006, औरत की अभिव्यक्ति एवं आदमी का अधिकार 2004

    सात अनूदित किताबें : निर्मला पुतुल, कात्यायनी और पवन करण की कविताओं का मलयालम में अनुवाद।

    सरोजिनी साहू की रचनाओं-उपन्यास, कहानी एवं आलोचना-का मलयालम और हिन्दी में अनुवाद।

    ई मेल : prameelakp2011@gmail.com

    loading...
      • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Funda An Imprint of Radhakrishna
      • Korak An Imprint of Radhakrishna
    Location

    Address:1-B, Netaji Subhash Marg,
    Daryaganj, New Delhi-02

    Mail to: info@rajkamalprakashan.com

    Phone: +91 11 2327 4463/2328 8769

    Fax: +91 11 2327 8144