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Shrikant Verma Rachanawali (Vol. 1-8)

Shrikant Verma Rachanawali (Vol. 1-8)

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Special Price Rs. 7,200

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  • Year: 2014
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126727292
  •  
    श्रीकांत वर्मा मुक्तिबोध की पीढ़ी के बाद के कवियों में अन्यतम बेचैन और उत्तप्त कवि इस माने में ज्यादा हैं कि उन्होंने अपनी कविता के जरिए न केवल अपने समय का सीधा, तीक्ष्ण और अन्दर तक तिलमिला देनेवाला भयावह साक्षात्कार किया बल्कि हर अमानवीय ताकत के विरुद्ध एक निर्मम और नंगी भिडं़त की । इसीलिए उनकी कविता में नाराज़गी, असहमति और विरोध का स्वर सबसे मुखर है । उनकी कविता उस दर्पण की तरह है, जहाँ कोई झूठ छिप नहीं सकता । उनकी कविता हर झूठ के विरुद्ध कहीं प्रतिशोध है तो कहीं सार्थक वक्तव्य । शायद इसीलिए वे सन् 60 के बाद की कविता के हिन्दी के पहले नाराज़ कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए । वे एक ओर मानवीय संवेदना के गहन ऐन्द्रिक प्रेम और क्षोभ के विरल कवि हैं तो दूसरी तरफ सामाजिक कर्म की कविता में नैतिक क्षोभ से उपजे सामाजिक हस्तक्षेप के दुर्लभ कवि हैं । वे उत्तर खोजने के बजाय प्रश्न खड़े करनेवाले कवि हैं । भटका मेघ से शुरू हुई श्रीकांत वर्मा की काव्य–यात्रा माया दर्पण, दिनारंभ और जलसाघर से गुज़रते हुए एक ऐसी कवि की दुनिया है जहाँ बीसवीं शताब्दी के मनुष्य की अपने समय से सीधी बहस है । कवि दूसरे से उलझने के बजाय स्वयं से प्रश्न करता है जहाँ उसके आत्माभियोग और आत्म–स्वीकार का स्वर सबसे मूल्यवान है । मगध और गरुड़ किसने देखा है एक ऐसे कवि की अथाह करुणा की पुकार है जो युग–संधि पर खड़ा अपने समय के मनुष्य, समाज, राजनीति, इतिहास और काल को बहुत निर्मम होकर बेचैनी के साथ देखते हुए मनुष्य और समाज की नियति को परिभाषित कर रहा है । इसीलिए मगध समकालीन व्यवस्था का मर्सिया भर नहीं है बल्कि समय, समाज और व्यवस्था के विरुद्ध एक सीधा हस्तक्षेप है । इस खंड में पहली बार श्रीकांत वर्मा की संपूर्ण प्रकाशित– अप्रकाशित, संकलित–असंकलित कविताओं का संचयन किया गया है जिसमें दर्ज है–एक कवि का सम्पूर्ण संसार जो अनेक संसारों में फैला हुआ है । इसके अतिरिक्त इस खंड में पुस्तकों की भूमिकाएँ, सम्पादकीय और अपने समकालीनों के साथ दो महत्त्वपूर्ण संवाद भी मौजूद हैं ।

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    Arvind Tripathi

    अरविन्द त्रिपाठी

    जन्म : 31 दिसम्बर, 1959, गोरखपुर (उ.प्र.) के गाँव कोहड़ाभाँवर में।

    शिक्षा : आरम्भिक शिक्षा और साहित्यिक संस्कार पिता से विरासत में मिला। विद्यार्थी जीवन में जे.पी. आन्दोलन में छात्रों की अगुवाई। गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर से एम.ए. (हिन्दी) और 'नई कविता का विचार-दर्शन’ विषय पर डॉक्टरेट।

    सन् ‘85 में श्रीकान्त वर्मा के आमंत्रण पर दिल्ली आगमन।

    युवा रचनाकारों के बीच बहुचर्चित 'श्रीकान्त वर्मा स्मृति पुरस्कार’ के मानद सचिव और संयोजक। पिछले दो दशकों में देश के अनेक विश्वविद्यालयों, संस्थाओं द्वारा आयोजित संगोष्ठियों में काव्यपाठ, व्याख्यान, आलेख, पाठ और बहसों में सक्रिय हिस्सेदारी। अपनी तेजस्वी वक्तृता के लिए सुपरिचित। सन् ’88 में आकाशवाणी सेवा में प्रवेश। रेडियो को साहित्य और विचार की मुख्यधारा से जोड़ने का अथक उद्यम। हिन्दी की प्रसिद्ध पत्रिका 'आलोचना’ के सह-सम्पादक और 'वर्तमान साहित्य’ पत्रिका के शताब्दी आलोचना विशेषांक के अतिथि सम्पादक रहे।

    इसके अलावा दर्जनभर सम्पादित संकलनों में कविता, लेख, साक्षात्कार प्रकाशित।

    प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ : शताब्दी मनुष्य और नियति (1998), आलोचना की साखी (2000), कवियों की पृथ्वी (2003) [आलोचना]; श्रीकान्त वर्मा (1998), देवीशंकर अवस्थी (2006) [मोनोग्राफ]।

    सम्पादन : श्रीकान्त वर्मा रचनावली (1995), प्रतिनिधि कविताएँ : अशोक वाजपेयी (1999), प्रतिनिधि कविताएँ : विनोदकुमार शुक्ल (2013), जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध कहानी 'पुरस्कार’ का रूपान्तरण (1996), आलोचना के सौ बरस (तीन खंडों में) (2002)।

    प्रमुख सम्मान : हिन्दी अकादमी, दिल्ली की ओर से 'मेरा घर’ कविता के लिए पुरस्कृत (1986), हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा 'हमारे समय की कविता’ के लिए 'कृति सम्मान’ (1998), देवीशंकर अवस्थी स्मृति सम्मान (2004), म.प्र. शासन का आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पुरस्कार (2000)।

    सम्प्रति : इन दिनों आकाशवाणी गोरखपुर में प्रसारण सेवा के प्रमुख।

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