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Shesh Yatra

Shesh Yatra

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  • Pages: 130p
  • Year: 2017, 12th Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788171788521
  •  
    Digital Edition Available Instantly on Pajkamal Books Library on
    शेष यात्रा अनु प्रणव के अपने फैसले का शिकार हुई, वरना वैसा घर, वैसा वर न तो उसके सपनों में था, न सामर्थ्य में। गली-मोहल्लोंवाले कस्बाई परिवार से निकलकर वह लड़की अचानक अमेरिका जा बसी - डॉ. प्रणवकुमार की परिणीता बनकर। सब कुछ जैसे पलक झपकते बदल गया - घर-परिवेश, रहन-सहन, खान-पान। अनु ने बड़ी मुश्किल से अपने को सँभाला और प्रणव की आकांक्षाओं, रुचियों के अनुरूप ढाल लिया। दिन-दिन डूबती चली गई प्यार की गहराइयों में। लेकिन शीघ्र ही उसे लगने लगा कि वह वहाँ अकेली है। प्रणव की तो छाया तक उन गहराइयों में नहीं। वह तो मात्र तैराक है - भावमयी लहरों को रौंदकर प्रसन्न होनेवाला एक महत्त्वाकांक्षी और अस्थिर पुरुष। ठगी गई अनु अपनी सुन्दरता, अपने संस्कार और सहज विश्वासी मन से। लेकिन आत्महत्या वह नहीं करेगी। टूट-बिखरकर भी जोड़ने की कोशिश करेगी स्वयं को, क्योंकि दलित-आश्रित रहना ही नारी-जीवन का यथार्थ नहीं है। यथार्थ है उसकी निजता और स्वावलम्बन। सुपरिचित कथाकार उषा प्रियम्वदा की अनु वस्तुतः नारी-मन की समस्त कोमलताओं के बावजूद उसके जागते स्वाभिमान और कठोर जीवन-संघर्ष का प्रतीक है, जिसे इस उपन्यास में गहरी आत्मीयता से उकेरा गया है। उच्च-मध्यवर्गीय प्रवासी भारतीय समाज यहाँ अपने तमाम अन्तर्विरोधों, व्यामोहों और कुंठाओं के साथ मौजूद है। अनु, प्रणव, दिव्या और दीपांकर जैसे पात्रों का लेखिका ने जिस गहन अन्तरंगता से चित्रण किया है, उससे वे पाठकीय अनुभव का अविस्मरणीय अंग बन जाते हैं।

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    Usha Priyamvada

    हिन्दी की विशिष्ट कथाकार।

    शिक्षा : इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में पी-एच.डी., इंडियाना यूनिवर्सिटी, ब्लूमिंगटन, अमेरिका में तुलनात्मक साहित्य में दो वर्ष पोस्ट-डॉक्टरल अध्ययन शोध। अध्यापन के प्रथम तीन वर्ष दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज दिल्ली, तदुपरान्त इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दो वर्ष में सम्पन्ना करके, विस्कांसिन विश्वविद्यालय मेडिसन के दक्षिण एशियाई विभाग में प्रोफेसर रहीं। हिन्दी और अंग्रेजी, दोनों ही भाषाओं में समान रूप से दक्ष उषा प्रियम्वदा ने साहित्य सृजन के लिए हिन्दी और समीक्षा अनुवाद और अन्य बौद्धिक क्षेत्रों के लिए अंग्रेजी का चयन किया।

    प्रकाशित पुस्तकें : उपन्यास : पचपन खम्भे लाल दीवारें (1961), रुकोगी नहीं राधिका (1966), शेष यात्रा (1984), अन्तर-वंशी (2000), भया कबीर उदास (2007)। कहानी-संग्रह : फिर बसंत आया (1961), जिन्दगी और गुलाब के फूल (1961), एक कोई दूसरा (1966), कितना बड़ा झूठ, मेरी प्रिय कहानियाँ, शून्य एवं अन्य रचनाएँ, सम्पूर्ण कहानियाँ (1997)।

    इसके अतिरिक्त भारतीय साहित्य, लोककथा एवं मध्यकालीन भक्ति काव्य पर अनेक लेख, जो अंग्रेजी में समय-समय पर प्रकाशित हुए। मीराबाई और सूरदास के अंग्रेजी अनुवाद साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने पुस्तक रूप में प्रकाशित किए। उन्होंने आधुनिक हिन्दी कहानियों के भी अनुवाद किए।

    इंडियन स्टडीज विभाग से संलग्न रहते हुए 1977 में उन्हें 'फुल प्रोफेसर ऑफ इंडियन लिट्रेचर’ का पद मिला। 2002 में अवकाश लेकर अब पूरा समय लेखन, अध्ययन और बागबानी में बिता रही हैं।

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