• (011) 23274463
  • Help
INR
 
Shopping Cart (0 item)
My Cart

You have no items in your shopping cart.

You're currently on:

Sanshodayu

Sanshodayu

Availability: In stock

-
+

Regular Price: Rs. 95

Special Price Rs. 85

11%

  • Pages: 104p
  • Year: 1998
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: SANSH291
  •  
    ' जापान ' का नाम सुनते ही आज आधुनिकता, समृद्धि और चकाचौंध का विचार कौंधता है । लेकिन, सौ बरस पहले का जापान कत्तई अलग था । इस संकलन में शामिल मोरी ओगाई ( 1862 - 1922) की तीन कहानियाँ तत्कालीन जापान की एक दूसरी तस्वीर पेश करती हैं । ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रची गई ये कहानियाँ ' सूर्योदय के देश ' के सामंती युग के विभिन्न पहलुओं से परिचित कराती हैं । सानशोदयु, अँधेरे में एक नाव चलती थी और आखिरी पंक्ति आपराधिक कथानकों के जरिए तत्कालीन राज और समाज की विदूपताओं को एक-एक कर सामने लाती हैं । लेकिन, ये कहानियाँ आपराधिक दृष्टांत मात्र नहीं हैं । सानशोदायु और आखिरी पंक्ति में आप पाएँगे कि किस तरह बाल चरित्र सामाजिक विसंगतियों से मुकाबले के लिए ऐसे वक्त में उठ खड़े होते हैं, जब उनके अग्रज व्यवस्था के सामने हथियार डाल देते है । नन्हें चरित्र तत्क्षण महाकार ले लेते हैं । वे जापानी समाज को ' आत्मबलिदान ' जैसी सर्वथा नई अवधारणाएँ सिखाते हैं । 'अंधेरे में ' कहानी जापानी जनमानस पर बौद्ध मत के प्रभाव को खासकर उकेरती है । इसलिए यह भारतीय पाठक को खासकर अपील करेगी । ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में अवतरित इन कहानियों के जरिए जापान के सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक जीवन दर्शन को जानने का अवसर प्राप्त होगा । कहानियों के साथ प्रविष्ट टिप्पणियाँ पाठकों की जिज्ञासा के अनुरूप दी गई हैं ।

    Customer Reviews

    There are no customer reviews yet.

    Write Your Own Review

    Unita Sachchidanand

    उनीता सच्चिदानन्द

    जन्म: 1959, ग्राम बग्याली (पौड़ी, गढ़वाल)।

    शिक्षा: एम.ए., एम.फिल, पीएच.डी. (जापानी भाषा एवं साहित्य), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय।

    डॉ. उनीता सच्चिदानन्द दिल्ली विश्वविद्यालय के चीनी व जापानी अध्ययन विभाग में रीडर हैं। आधुनिक जापानी साहित्य व विध्वित् अध्ययन व शोध नारा महिला विश्वविद्यालय, जापान में सम्पन्न किया। सन् 1990 में जापानी सरकार की छात्र-वृत्ति एवं 1999 में जापान फाउंडेशन फेलोशिप पर जापान के कई विश्वविद्यालयों से सम्बन्धित डॉ. उनीता 1980 से लगातार हिन्दी बाल पत्रिकाओं के ज़रिए जापानी लोक व बाल साहित्य हिन्दी में उपलब्ध कराती रही हैं। 1997 में ‘फूजी पहाड़ से’ जापानी लोककथाओं का सचित्र संग्रह (पाँच भागों में) और जापानी युवा कहानियों के तीन संग्रह राजकमल प्रकाशन द्वारा 1998 में प्रकाशित एवं भारतीय लोक व बाल साहित्य के जापानी रूपांतरण जापान में प्रकाशित।

    loading...
      • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Funda An Imprint of Radhakrishna
      • Korak An Imprint of Radhakrishna
    Location

    Address:1-B, Netaji Subhash Marg,
    Daryaganj, New Delhi-02

    Mail to: info@rajkamalprakashan.com

    Phone: +91 11 2327 4463/2328 8769

    Fax: +91 11 2327 8144